Thursday, 7 May 2015

किस्सा लोकपाल और लोकतंत्र का...


किस्सा लोकपाल और लोकतंत्र का...
एक बार की बात है। आंदोलन नामक व्यक्ति के दो सुपुत्र थे। एक का नाम था लोकतंत्र और दूसरे का लोकपाल। कहने को लोकतंत्र बड़ा था किंतु अपने क्रियाकलापों के कारण लोकपाल ही बड़ा माना जाता था। वह लोकतंत्र और उसके मित्रों पे निरंतर नज़र रखता था। वह चाहता था कि उसका भाई चाह कर भी कुछ ग़लत न करे। कोई भी गलती होती तो फौरन पिताजी से शिकायत हो जाती। नामानुसार पिताजी आंदोलन कर डालते और सुपुत्र को कुपुत्र होने से बचा लेते। तीनों मे बड़ा सौहार्दपूर्ण सामंजस्य था। उनकी एकता, ईमानदारी एवं कमज़ोर के पक्ष मे लड़ने की शांतिपूर्ण कला के लिए वे दूर-दूर तक प्रख्यात हो गए थे। चहुंओर उनकी ही चर्चा थी। सब मन ही मन उन्हे अपना नेता और आदर्श मान बैठे थे।
उनकी अनवरत बढ़ती ख्याति से तमाम स्थानों की सरकारें और उनके नुमाइंदो की नाक-भौं सिकुड़ने लगी। उन्हे डर सताने लगा कि अगर ये लोग सत्ता के गलियारे मे चहलकदमी भी करने लगे तो उनकी दाल गलनी बंद हो जाएगी। मंत्रियों-सन्त्रियों ने मंत्रणा की। निष्कर्ष यह निकला कि तीनों को भ्रष्टाचारी, घोटालेबाजी जैसी मादक वस्तुएँ प्रदान की जाएँ। एक बार इनका नशा चढ़ गया तो छुड़ाए नही छूटता।
परंतु बाप-बेटे बड़े ज्ञानी एवं भविष्यद्रष्टा थे। उनके विशिष्ट सूत्रों से उन्हें सरकारों की यह चाल पता चल गयी। बस, बात ऐसे बिगड़ी कि बिगड़ती चली गयी। पिता ने सरकारों और उनकी नीतियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया और अपने नाम को शांतिपूर्वक सार्थकता प्रदान करने लगे। लोकपाल और लोकतंत्र ने अपने वकील, पत्रकार मित्रों के साथ एक बड़ा जनसमर्थन तैयार किया। अमूमन आम लोग सरकार से असंतुष्ट ही होते हैं। इनमें कुछ तो सरकार बनाने मे सहयोग देने वाले भी होते हैं। सब आंदोलन बाबू, लोकतंत्र और लोकपाल से जुड़ते चले गए। 
आंदोलन बाबू ने सरकार विरोधी धरने दिए। खराब नीतियों को हटाकर नयी नीतियां और सरकारी तंत्र मे पारदर्शिता लाने हेतु कई दिनों तक भूख हड़ताल भी की। उनके मुताबिक़ दुनिया या कि उनके देश का सबसे सच्चा, ईमानदार, साफ़दिल व्यक्ति सरकार की निगरानी करे। सरकार को घोटाले जैसे कृत्य करने से रोके। जो व्यक्ति इस क्रिया को सिद्ध कर सकता था, वह था आंदोलन बाबू का पुत्र लोकपाल। सो सभी लोकपाल की पैरवी करने लगे। नारेबाज़ी, पोस्टरबाज़ी, और सोशलमीडियाबाज़ी से चहुंओर इसका शोर होने लगा लोकपाल को सरकार के ऊपर बिठाना होगा। गोया इस देश की तरक्की तभी सम्भव होगी जब लोकपाल जैसा व्यक्ति प्रधानमंत्री से भी ऊपर के पद पर होगा। जैसे कि लगभग हर आदमी मे व्याप्त भ्रष्टाचार, दुष्कर्म, चोरी, डकैती, घरेलू हिंसा लोकपाल के आने पर रुक जाएगी। जैसे कि लोकपाल के आने पर लोग सड़कों पर थूकना बंद कर देंगे और यातायात के नियमों का कड़ाई से पालन करेंगे।
ख़ैर, इतना सब होने बावज़ूद सरकारों ने  बात नही मानी। आंदोलन बाबू ने थक हारकर घर वापसी का मन बनाया और और अपनी भूख प्यास मिटाई। उनके साथ लोकपाल भी चलना चाहता था। अचानक लोकतंत्र का माथा ठनका। कभी न बोलने वाला लोकतंत्र उस दिन बोलने लगा उसने औने भाई और पिता को समझाया - "देखो, अभी बहुत से सताये हुए लोग हमारे साथ हैं।यही मौका है कि हम कुछ बड़ा करें" 
आंदोलन बाबू ने पुत्र की मंशा जानते हुए भी उसे साफ-साफ समझाने को कहा। लोकतंत्र बोला "मैं चाहता हूँ कि हम एक पार्टी बनाए और चुनाव लड़ें।यदि जीत गए तो लोकपाल भाई को मैं उचित स्थान दिलाऊँगा। अपने देश को बदल दूँगा।" 
आंदोलन बाबू ने इसके लिए साफ इनकार कर दिया और घर वापसी कर गए। लोकपाल वही रुक गया ताकि अपने भाई की गतिविधियों मे वह भरपूर सहयोग कर सके।

चुनाव हुए। लोकतंत्र भारी बहुमत से  जीत गया। चारों ओर खुशी की लहर दौड़ गयी। लोकपाल भी ख़ुश था कि अंततः उसे उचित स्थान दिया जाएगा। लोकतंत्र ने अपने मित्रों से कहा कि हमें दूसरे दलों की भांति भ्रष्टाचारी, अत्याचारी और अहंकारी  नही बनना है। हमे तो सेवा करनी है।
लोकतंत्र ने शपथ ली। लोकपाल को अपने ऊपर बिठाया और उसे स्वतंत्रा से अपना काम करने को कहा।
कुछ ही दिन बीते होंगे कि लोकतंत्र की सरकार पर लोकपाल ने उँगली उठायी। जाँच बिठाई। लोकतंत्र को यह बात पसंद नही आयी। पसंद आनी भी नही थी। दरसल लोकतंत्र अब सत्ता और लोभ की क़ैद मे था। लोकतंत्र अब परतंत्र हुआ जा रहा था। अहंकारी परतंत्रतावादी लोकतंत्र को यह बात नागवार गुज़री कि कोई उसपर उँगली उठाए। परिणामस्वरूप उसने लोकपाल को बर्खास्त कर दिया। 
लोकपाल अपने ही भाई के इस कृत्य से अत्यधिक दुखी हुआ। वह अवसादग्रस्त हो गया। फ़िर उसका कहीँ कुछ पता नही चला। कूछ  महीनों बाद अखबारों मे सुर्ख़ियां बनी एक ख़बर आयी- "लोकतंत्र के भाई लोकपाल की संदिग्ध हालात मे मौत। प्रथमदृष्ट्या मामला आत्महत्या का लगता है। लोकतंत्र सदैव की तरह चुप्पी साध गए।" 
                                           - अभिषेक अवस्थी

Sunday, 19 April 2015

राजकुमार की घरवापसी...

राजकुमार की घरवापसी...
भले वे हार गए हों। भले ही उनकी गद्दी और साम्राज्य छिन गया हो। परंतु सत्य यही है कि तमाम लोगों के लिए वे अब भी एक राजकुमार ही हैं। वे स्वयं भी अपने कारनामों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से यही कहते रहे हैं। मीडिया से लेकर समर्थक और विरोधी, सब उनकी घरवापसी का जश्न अपने तरीके से मना रहे हैं। हो भी क्यों न। आखिर एक राजकुमार सत्ता से विमुख होकर तपस्योन्मुख हुआ। वह घोर तपस्या करने हाँगकाँग जैसे किसी चमकीले, तड़कीले एवं भड़कीले स्थान पर जो गया। यह कतई मज़ाक की बात नहीं कि तमाम शानोशौकत और मेनकाओं की उपस्थिति मे भी वह लगभग दो माह के लिए ऋषि के रूप मे तपस्या करते रहे। बाकी ये अंदर की बात है। हम जैसे आम लोगो को जब देश के अंदर की बात नहीं ज्ञात नहीं होती तो भला विदेश मे क्या गुल खिलते हैं, इसका पता न कभी चल पाया था, न चल पाएगा। वो तो भला हो न्यूज़ वालों का कि क्रिकेटर और उसकी गर्लफ्रेंड से फुर्सत मिलते ही उनके अदृश्य होने की तिथि, मिलने की तिथि और कारण समेत उसके बाद की स्थिति से हमे अवगत करवा दिया। महान लेखक शरद जोशीजी ने कहा है – नियम की बात है कि हर तपस्या कुछ दिन बाद मज़े ज़रूर देती है। यह तय है कि मज़े मिलेंगे। यह बात दीगर है कि अब पाँच वर्ष प्रतीक्षारत रहना होगा। किन्तु मज़े मिलेंगे। क्योंकि मज़े देने वाले हम आम-कुमार ही हैं। हमारे पास विकल्प कम होते हैं।
उनका लौटना एक चिंगारी सी है। बेरोज़गार हुए उनके समरर्थक रूपी कार्यकर्ता यकायक नौकरी बजाने निकल पड़े। गोया कि वे जीत सुनिश्चित करने का कोई फॉर्मूला लेकर लौटे हों। जो पटाखे विजयावस्था मे फोड़ने का सपना था, वह तो पूरा न हुआ। दिवाली मे हार के गम के चलते पटाखे फोड़ने का मन न हुआ। विश्वकप ने भी मौका न दिया। लेदेकर अब मौका आया है। इससे पहले कि पटाखे एक्सपायर हो जाएँ उन्हे प्रयोग मे लाना ही होगा। सो सभी पिल पड़े। एक ऐसे ही विस्फोटक समर्थक से मेरी भेंट हुई। मैंने जश्न का कारण पूछते हुए कहा – वे मात्र विदेश मे छुट्टियाँ व्यतीत कर के ही तो आए हैं। कौन सा इंद्रदेव को समझा कर आए है कि भारत के किसानों को बख्श दें? अथवा ऐसा क्या ले आए हैं कि चतुर्दिश उनके लौटने का ही चर्चा है? क्या वे अपने चिंतन और मंथन के थैले मे कालाधन वापस लाने की कोई सृदृढ़ योजना लाए हैं? वे बोले- तब हारे तो हारे। यह दो महीने की तपस्या उनकी नैतिक विजय है। उन्होने वहाँ जो चिंतन किया है, उसका मंथन अवश्य ही करेंगे। हम उसी का जश्न मना रहे हैं। इसमे आम लोगो का कोई स्थान नहीं है। अतः आप दूर रहें। मैं सदैव की भांति चुप रहा और खुश रहा। अपने घर की गली पकड़ कर मैंने घरवापसी तय करी।
घर लौटते हुए मैंने पाया कि कुछ विरोधी गुट के लोग भी नाच गाना कर रहे थे। वे भी पटाखे फोड़ रहे थे। अंतर यह थे कि समर्थकों के पटाखे बड़ी उदासीनता के साथ ऊपर जाकर बिना आवाज़ किए फूट रहे थे। विरोधियों के पटाखे दहाड़ते हुए फुट रहे थे। एक विरोधी से मैं पूछ बैठा, भाई! राजकुमार तो उनके लौटे हैं। आप किस बात का जश्न बना रहे हैं? वह बोला – जिनके कारण हमे गद्दी मिली है, जी वे लौट के घर आ गए हैं, तो खुशियाँ मनाना तो बनता है न! और वैसे भी अब वे आ गए हैं तो मीडिया वाले थोड़ा हंसी-ठिठोली भी कर लेंगे और कुछ दिन हमे चैन से रहने देंगे
मैंने सोचा कि बात तो बंदा सही कह रहा है। हंसी ठिठोली तो हो ही रही है। सारा फोकस किसानों की अत्महत्या, बर्बर व्यवस्था, लूट-मार, भ्रष्टाचार आदि से हटकर राजकुमार पे जो आ गया है।

                           -अभिषेक अवस्थी 

Wednesday, 31 December 2014

जब मैं गाँव आता हूँ

जब मैं गाँव आता हूँ ...// Abhishek
जब कभी लंबे अरसे के बाद
मैं गाँव आता हूँ,
ख़ुद-ब-ख़ुद ‘मैं’ से 
‘हम’ हो जाता हूँ...
उतार कर शहरी लबादा
और उसमे छुपे ढेरों अस्क़ाम
दिखावे से कोसों दूर,
मैं ख़ुद मे ख़ुद को पा जाता हूँ...
ख़लिश सी तो है
कि अब यहाँ कोई रहता नहीं
इस बड़े घर मे
जो धीरे धीर मकान हो रहा है,
फिर हमारी उम्र की तरह ही
खंडहर हो जाएगा...
लेकिन बड़ी यादें हैं यहाँ ,
गर्मियों मे गिनती के पचास दिन यहीं बिताना
धूप मे खेल कर स्वयं को भुजंग बनाना
दादी के स्कूल मे अपने गर्द शहरीपन का
बेमतलब मे रौब जमाना...
और सबसे यादगार तो है
चाची के हाथों से बना ‘पूरा खाना’
बनता वही था
दाल-चावल-सब्ज़ी-रोटी रोज़ाना
मगर स्वाद हर बार एकदम नया...
फिर रात मे एक बड़ा गिलास दूध का
जिसमे चीनी के साथ होती थी
चाची के प्यार की ममताभरी मिठास...
सच! अच्छे दिन तो वे ही थे...
घर के मंदिर मे हर छोटा-बड़ा त्योहार
भाई-बहनों संग उमंग से मनाना...
शिवरात्रि मे ‘शंकरजी’ के लिए
कुएं से ढेर सारा पानी निकालना...
होली-दिवाली पे
चाचा के सानिध्य मे
रंग खेलना और पटाखे फोड़ना...
बहुत याद आता है सब
मंदिर मे जड़ी भगवानों की मूर्तियाँ
वैसी की वैसी ही हैं- पूर्णतः शांत
बस कुछ बदला है तो
बदले हैं गाँव के लोग
जो ‘हम’ से ‘मैं’ हो गए
मैं, मेरे अपने भी है उसमे
या कि जैसे
शिक्षित होने के साथ
हम भाई-बहन सच मे ‘कज़िन’ हो गए....
बैठा हूँ उसी मंदिर पे ,
लगता है जैसे वही बचपन जी रहा हूँ अभी...
यहीं रह जाने का मन करता है,
मगर दिलो-दिमाग ने
फिर धारण कर लिया चोला शहर का
और मेरा ‘शरीर’ चल पड़ा है फिर
शहर की ओर ... गाँव से दूर ...
@अभिषेक2015

Tuesday, 30 December 2014

ठंड मे रेल यात्री और न्यूज़ एंकर...

ठंड मे रेल यात्री और न्यूज़ एंकर...
प्रतिदिन भिन्न-भिन्न न्यूज़ चैनलों के माध्यम से ज्ञात होता है कि वह दिन पिछले दशक मे सबसे ठंडा रहा। मुझे बड़ा ताज्जुब होता है कि जो न्यूज़चैनल परसों हुए बलात्कार के समाचार संग अपना तथाकथित आक्रोश दिखाते है, फिर दो दिन के पश्चात किसी क्रिकेटर और अभिनेत्री के रिश्तों पर अपना फोकस लौटा लाते हैं, वही न्यूज़ चैनल दस वर्ष पुराने आंकड़े भी सुरक्षित रखते हैं।
पिछले दिनों मैं कहीं जाने हेतु ट्रेन मे चढ़ा। ट्रेन को जबर्दस्त ठंड लगी हुई थी, सो बेचारी 12 घंटे विलंब से आई। चढ़ते ही ऐसा लगा जैसे संसद मेपक्ष गायब हो और विपक्ष उपस्थित हो। अधिकतर सीटें खाली थीं और टीटी महोदय उपचुनाव के यथोचित प्रत्याशी से यथासंभव लक्ष्मी वसूलने हेतु बोगी के दरवाजे पर जमे हुए थे। अपने शिकार को करीब आता देख वे चौकन्ने खड़े हो जाते, और अचानक सरकारी नौकर से चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया की भूमिका मे आ जाते हैं। हमारे देश मे तीन लोग जब अपनी वर्दी मे होते हैं तो वे अमूमन स्वयं को ईश्वर-तुल्य मानते हैं। एक पुलिस का सिपाही, सरकारी डॉक्टर, और टीटी महोदय। ये प्राणी जब ऑन ड्यूटी होते है तो अच्छे भले इंसान की ब्यूटी बिगाड़ सकते हैं।
मैं बिस्तर लगा ही रहा था कि कोच मे धड़धड़ाते हुए एक न्यूज़ एंकर ऐसे घुसे जैसे टीवी पे एक दंतमंजन के विज्ञापन मे अदाकारा अपनी एंट्री मारती है। मुझे डर लगा कि कहीं वह एंकर मुझसे मेरे बंदरछाप दंतमंजन मे नमक होने के बारे मे पूछताछ न करने लगे। किन्तु जैसे काला धन आते-आते रुक गया, वैसे ही वो न्यूज़ एंकर अपने विडियो जर्नलिस्ट के साथ दो बर्थ पहले ही रुक गया।
उसने पास बैठे बुज़ुर्ग से कहा, चाचा, आप से कुछ प्रश्न करेंगे, फटाफट बिना बकलौली के उत्तर दीजिएगा।
चाचा भी कम न थे। ऐसे जवाब दिए कि कपिलशर्मा भी उनके पैर पकड़ लें। बानगी पेश है-
एंकर: ये बताइये, ट्रेन लेट है क्या? कितना लेट है?
चाचा: आपने जांचा नहीं क्या? ऐसे ही हवा मे चढ़ गए। लेट है तभी तो आप से मिले, वरना घर मे आराम से सो रहे होते चारपाई पे।
एंकर: तो क्या परेशानी है आपको?
चाचा: जी गठिया का दर्द अपने चरम पे है।
एंकर: गठिया नहीं, ट्रेन लेट होने से जो परेशानी हुई, वो बताओ बुढ़ऊ।
चाचा: इत्ते कोहरे मे मरवाएंगे क्या? ड्राईवर अगर ट्रेन समय पर पहुंचाएंगे, तो हम यात्री घर की बजाय हरिद्वार जाएंगे। ट्रक के पीछे पढ़ा नहीं क्या आपने- धीरे चलोगे - घर मिलेगा, तेज़ चलोगे - हरिद्वार मिलेगा। ठीक ही है जो लेट है। आजकल तो विमान गायब हो रहे हैं, फिर ये ट्रेन कम से कम आई तो है। देर आए पर दुरुस्त आए।
मनमुताबिक उत्तर न पाने के कारण एंकर आगे बढ़ गया। कुछ ऐसे प्रश्न किए कि यात्री और हलकान हो गए। मसलन, आप कहाँ जा रहे हैं? क्या लगता है कि ट्रेन इतनी लेट कैसे हुई? क्या इसका मुख्य कारण मौसम है या कोई सरकारी वजह? जब आपको पता था कि इस समय मौसम खराब रहता है तो इसी ट्रेन से आरक्षण क्यों करवाया? क्या जाना ज़रूरी था? किससे मिलने जा रहे हैं? क्या पहले कभी सोचा था कि ट्रेन इतनी लेट हो सकती है?
यदि आप कोई रेल यात्रा करने वाले हों तो उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर अपनी पूर्वनियोजित यात्रा की भांति ही पूर्व-सू-नियोजित कर लें। क्या पता आपकी बोगी मे भी कल कोई रिपोर्टर घुस आए और आप पर बंदूक की तरह अपना माइक तान दे। तत्पश्चात आपके जले पे देश का नमक न सिर्फ छिड़के,वरन उड़ेल भी दे।    
                            -अभिषेक अवस्थी

Tuesday, 26 August 2014

जाएँ तो जाएँ किधर, हाय! रे सीरियल किलर...

जाएँ तो जाएँ किधर, हाय! रे सीरियल किलर...
अरे! आप नाहक न घबराएँ। मैं किसी क्रमिक हत्यारे की बात नहीं कर रहा हूँ। ऐसे लोग तो भारत मे ज़ाबज़ा पाए जाते हैं। कुछ खादीधारक और महंगाई डायन उन्हीं मे से एक है। अब तो प्याज़ और टमाटर ने भी आमजन के स्वाद की हत्या कर दी है। ये उन्हीं को नसीब है, जिनके गाल लाल होते हैं। 
खैर, टमाटर-प्याज़ की मूल्यवृद्धि तो किसी बड़े नेता की संपत्ति की भांति, वर्षानुवर्ष घटित होने वाली  एक सामान्य घटना है। यहाँ बात हो रही है घर घर मे चल रहे (या यूँ कहें कि बस रहे) परम (अ)पूजनीय हाफिज़ और बगदादी से ज़्यादा ख़तरनाक सिरियल किलर की। ये हमारे आपके घरों मे ऐसे कुंडली मारे बैठा है, जैसे कोई आम साँप किसी नागमणि को दबाये बैठा हो। हम जैसे कलमघिस्सुओं को बुद्धू बक्से (टी.वी.) मे दिखाए जा रहे ये डेली सोप्स बड़े जानलेवा लगते हैं।
कभी कभार तो मुझे लगता है कि विद्यार्थियों को इतिहास के कुछ पाठ पढ़ाने मे शिक्षक व्यर्थ ही मेहनत करते हैं। स्कूल मे एक टी वी ही रख देना चाहिए। महाभारत, महाराणा प्रताप, अशोक, चाणक्य, चन्द्रगुप्त और अकबर आदि पर आधारित विषयों का ज्ञानार्जन छात्र स्वयं ही कर लेंगे। बच्चे तो अब सब कुछ टी वी से ही सीख रहे हैं न। एक दिन मैंने अपने मित्र के सुपुत्र से राह   चलते अकबर के बारे मे पूछ लिया, तो उसका उत्तर सुन मेरा इतिहास का ज्ञान पानी भरने लगा। उसने कहा कि अकबर शहँशाह ए हिन्द था। वह ऐसा बादशाह था, जो जोधा के आगे पीछे घूमता रहता था। आवाज़ मे खराश के बावजूद भी उसकी डायलॉग डिलिवरी कमाल की हुआ करती थी। वो पंद्रह बीस सैनिकों की सेना साथ ही युद्ध करने निकल पड़ता था। मैंने उससे आग्रह किया कि ज़रा भारत के वीर पुत्र महाराणा प्रताप के बारे मे भी अपना टीवीनुमा ज्ञान साझा करे। वह खुश होते हुए बोला- प्रताप सच मे भारत का वीर पुत्र था। हमारे जैसी पंद्रह वर्ष की बाली उमरिया मे ही वो फूल और अजब के मध्य गज़ब का संतुलन बनाना सीख गया था और वीरता से उसका निर्वाह कर रहा था।    
उधर दूसरी ओर, हर धारावाहिक मे करोड़पति परिवार मे सास या बहू किसी आतंकवादी सरगना से कमतर नहीं लगती। बैठे बिठाये ये सास और बहुएँ एक दूसरे को मात देने हेतु नूतन पैंतरे सीखती है। टी वी के साथ साथ हमारे आपके घरों मे भी खटराग रोज़ाना अलापा जाता है। आजकल के धारावाहिक तो जैसे समाप्त होने का नाम ही नहीं लेते। वे महंगाई, भ्रष्टाचार और अत्याचार की भांति बढ़ते ही जा रहे हैं। लगभग सभी धारावाहिकों मे कहानी और लंबाई मे गज़ब की एकता दिखती है। कमाल की बात ये है कि ये धारावाहिक बनाने वाले अर्थशास्त्र के बड़े ज्ञाता होते हैं। मांग और आपूर्ति के बीच लोचदार संतुलन बनाए रखते हैं। ये जानते हैं कि जनता सदैव एक उदासीन वक्र ही रहेगी। कई बार तो ऐसा होता है कि जिसे हम बेटा/बेटी समझते हैं, वह पिता/माँ निकलते हैं। यदि नायक और नायिकाएँ दो तीन बार मरने के पश्चात पुनर्जन्म न लें, तो समझो नाटक मे दम नहीं रहा। नए ट्रेन्डानुसार कई धारावाहिकों को सरकारी पंचवर्षीय योजनाओं की भांति आगे खिसखाने का कार्यक्रम अनवरत जारी है। हर माह एक नया चैनल और सीरियल उत्पन्न हो जाता है। कभी कभी तो लगता है, मानों इन सीरियल्स ने भारत की बढ़ती आबादी के आंकड़े को ठेंगा दिखाने की ठानी हो।
आलम यह है कि अब तो आदमी अपने कार्यालय से घर पहुंचता है, तो उसे ठंडे खाने से ही संतोष करना पड़ता है। घर की सारी महिलाएं अपने पसंदीदा कार्यक्रम देखने के लिए भोजन की व्यवस्था घंटों पहले ही कर देती हैं। पुरुषों को इसी बात से संतोष करना पड़ता है कि इस टी वी के कारण दिन के कुछ घंटे उन्हे शांतिपूर्वक व्यतीत करने को मिल जाते हैं।
मेरे पड़ोसी शर्मा जी छुट्टियों मे परिवार समेत किसी फूहड़ रियालिटी शो मे जाने का प्लान बना रहे हैं। वे यह जान कर खुश हो रहे हैं कि दर्शक बनने के भी पैसे मिलते हैं। छुट्टियों का अच्छा उपयोग हो जाएगा। कुछ घंटे दर्शक बनेंगे और कुछ घंटे मौज मस्ती करेंगे। मैंने उन्हें बता दिया है कि पूरा प्रबंध कर के जाएँ। मसलन भोजन की व्यवस्था सुदृढ़ कर लें और पानी जैसे तरल पदार्थ कम लें। पता नहीं स्टुडियो के बाहर कब निकलने दिया जाए।

-    अभिषेक अवस्थी


बिजली कटौती की ‘थर्ड डिग्री’ यातना ...

बिजली कटौती की थर्ड डिग्री यातना ...
आजकल उत्तर प्रदेश की जनता बेहद खौफ़ज़दा है। हर पल डर के साए मे जीवनयापन करने वाली जनता अमित शाह के चुनावी खेल मे भाग लेकर खासा परेशान है। वह पछता रही है। जनता जिस खेल मे स्वयं को मैन ऑफ दि मैच समझने के प्रवंचन मे थी, उसमे वह बस पानी पिलाने वाले खिलाड़ी की तरह ही थी। अच्छे दिन के जोश मे, उत्तर प्रदेश की जनता ने वोट को शक्ति समझने  का जो कांड कर डाला, उसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है। चुनाव के दो माह चार दिन की चाँदनी के समान थे और अब हमारे जीवन मे अंधेरी रातें मात्र ही बची हैं।
खैर, मैं बात कर रहा था जनता (हमारे) के खौफ़ज़दा होने की। चौंकिए मत जनाब! यू पी वाले बलात्कार, चोरी, डकैती, हत्या, घूसख़ोरी, फिरौती आदि से अब कदापि भयभीत नहीं होते हैं। नेता जी के आशीर्वाद से लोगो को अब इनकी आदत सी है। उत्तर प्रदेश का आई एस आई एस तो बिजली कटौती है, जिससे जनता बड़ी आतंकित रहती है। प्रदेश के हुक्मरानों को पता है कि आमजन को सबक सीखाने हेतु बिजली कटौती से अच्छी थर्ड डिग्री प्रताड़ना नहीं हो सकती है। आलम यह है कि हम रात भर बिजली के स्वागत मे बाहें बिछाए रहते हैं, किन्तु ये बिजली एक्सप्रेस है कि इटावा स्टेशन से हिलने का नाम ही नहीं लेती है। जनता बिजली के गमनागमन से वैसे ही आतंकित महसूस कर रही है जैसे हमास के लोग बम वर्षा से भयभीत हैं।
मेरे परम मित्र ने मुझे बताया कि उन्होने सरकार को एक हलफ़नामा और माफ़ीनाम भेजा है। जिसमे उन्होने  लिखा है कि वे अपनी भूल स्वीकार करते हैं। आगामी चुनावों मे वे इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे कि अपने प्रदेश मे सरकार किसकी है और उसका कार्यकाल कितना बचा हुआ है। अब वोट को अपनी ताकत नहीं, वरन मजबूरी समझ उसका क्रियान्वयन करेंगे।
मित्र को इतना आतंकित देखकर मैं भी आतंकित हो गया हूँ। अपने घर के सारे विद्युत उपकरण की तस्वीरें ओएलएक्स पे अपलोड कर दी हैं। किन्तु वहाँ यह समस्या है कि उत्तर प्रदेश के अधिकांश लोग उपकरण खरीदना नहीं बल्कि खुद बेचना चाहते हैं। दूसरे प्रदेशों के लोग यह कह कर मुंह मोरहे हैं कि जो उपकरण लंबे समय तक बंद पड़े हों, वे अमूमन काम करना बंद कर देते हैं।
                -       अभिषेक अवस्थी

Monday, 4 August 2014

आगे कुआं पीछे खाई...

आगे कुआँ पीछे खाई...
जनता अब जनार्दन नहीं रह गयी है। वह एक ऐसी फुटबॉल बन गयी है, जिसे राजनीति के मारीडोना और मेसी अपने अपने पाले मे करने के लिए लतियाते रहते हैं। जनता अर्थात हम, जिनको न चाहते हुए भी तथाकथित जनसेवकों की लाते खानी पड़ती हैं, और हम विवश हो उनकी बातें मान लेते हैं। जनता की हालत उस गधे के माफिक हो गयी है, जो अपनी समझदारी के चक्कर मे न घर का रहता, न घाट का। इसी राजनैतिक उठापटक मे मेरे कई मित्र एवं पड़ोसी अपना रोना रोते दिखाई दे रहे हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार का बजट आने के पश्चात ही पड़ोसी शर्मा जी के बच्चे चुन्नू और मुनिया उनपर ऐसे बरसे, जैसे आजकल आसमान से आग बरस रही है। वे कुछ कुछ डिप्रेशन का शिकार भी हो रहे थे। इसी तनाव के चलते एक दिन चुन्नू ने अपने गुस्से, दुख और कुंठा की चटनी बनाई और शब्द बाणों मे लपेट दुखी मन के धनुष से शर्मा जी पर वार किया। उसने कहा, पापा, मेरे सारे हसीन सपने आप लोगों के डीसीजन के कारण चूर चूर हो गए...आप से कितनी बार कहा था कि बहुत सोच समझ कर वोट देना... पड़ गए न लेने के देने। यह कहते कहते चुन्नू की आँखों से टी वी की उस नायिका की भांति गंगा जमुना बहने लगीं, जिसका शादी के पश्चात कनाडा जाने का सपना टूट जाता है। शर्मा जी को एफ. बी. आई. की भांति अपने बेटे द्वारा किए जाने वाले हमले का पूर्वाभास था। सो वे आधुनिक युग के आज्ञाकारी बाप की तरह अपना मुंह सीए बैठे थे। चुन्नू ने आगे कहा, सोचा था... किसी तरह बारहवीं पास कर के एक लैपटॉप पाऊँगा...फेसबुक पे डेली नयी गर्लफ्रेंड बनाऊँगा...रात भर उनसे चेटिंग...कुछ सेटिंग करूंगा...अपनी और दोस्तों की पसंद की देसी, विदेशी, नीली, पीली, हर तरह की रंगीली फिल्म देखूंगा। लेकिन आपने भाजपा को वोट देकर सारा बेड़ा गर्क कर दिया। शर्मा जी अपने पुत्र की मनोदशा का एहसास कर, हल्कान हुए जा रहे थे। अपराध बोध के चलते उनकी आंखे ज़मीन पर ऐसे गड़ी जा रहीं थी, जैसी अभी ड्रिल कर के धरातल का सारा पानी बाहर निकाल देंगे। रेडियो पे गाना बज रहा था- तेरे नैना दगाबाज रे...।
उधर शर्माईन को मुनिया की खरी खोटी सुननी पड़ रही थी। राजधानी एक्सप्रेस की भांति वह अपने दिल की एसिड रेन बरसाते हुए बोली, मम्मा!! ये बहुत गलत किया आपने...नॉट फेयर। सोचा था कि इस बार कन्या विद्या धन, मैं अपनी फ्रेमिंग’, डिज़ाइनिंग’, और पैकिंग पे खर्च करूंगी। मुफ्त मे करीना बन, कॉलेज जाऊँगी...लेकिन नही, आप को कहाँ मंजूर था? चलो माना कि हम यू पी मे कोई खास सुरक्षित नहीं हैं। बिजली नहीं, पानी नहीं, लेकिन फ्री का लैपटॉप और धन तो था न। सोचा था, कॉलेज जाने से पहले ढेर सारी शॉपिंग करूंगी...अपने नए पुराने बॉयफ्रेंड्स को कुछ गिफ्ट्स दूँगी...और बदले मे मोटिवेट होकर, वे भी मुझपर धनवर्षा करेंगे... आई हेट यू बोथ... अब आप को ही इस नुकसान का हरजाना भरना पड़ेगा
ऐसे कई चुन्नू और मुनिया ने तो अपनी भड़ास अपने अभिभावकों पे निकाल ली, किन्तु कई शर्मा जी टाइप लोग बहुत परेशान हैं। उनका तथाकथित अच्छे दिन वाला ख्वाब अब मलेशियाई विमान की तरह लापता होता दिख रहा है। ट्रैवलिंग की जॉब वाले कई शर्मा जी, रेल किराए को लेकर तनावग्रस्त हैं। शर्माईन इन सबसे अलग, आलू, प्याज़, गैस और चीनी के लिए आब ए चश्म हुई जा रही हैं।
मेरे मित्र खन्ना के दोनों पुत्र तो अब बेरोजगारी का दंश झेलने पर विवश हैं। बेरोजगारी भत्ते से जो मज़े किए हैं, और बैठे बैठे खाने की जो लत लग गई थी, सरकार अब उसका गिन गिन के हिसाब चुकता करने पर अमादा है। खन्ना साहब के पुत्र अब अपना सिर पकड़े बैठे हैं, और आज तक मे    मित्रों मैं तो पी एम बन गया, पी एम बन के कैसा तन गया देख आँखों से भाकरा नंगल डैम का पानी बहा रहे हैं।
जनता अब करे भी तो क्या करे। उसे दिल्ली कुआँ, तो प्रदेश खाई समान प्रतीत हो रही है। इन सब के बावजूद जनता अब भी आशावान है। वह हमेशा की तरह, अगले पाँच वर्ष भी अच्छे दिनों के लिए प्रतीक्षारत रहेगी। वह अपने मूल कर्तव्य प्रतीक्षा” का निर्वहन निष्ठापूर्वक करती रहेगी। वह केंद्र एवं राज्य जैसे कुएं और खाई के बीच अपना संतुलन बनाए रखने का भरपूर प्रयास करती रहेगी।    
                                               @अभिषेक अवस्थी2014