Tuesday, 6 October 2015

MP Jansandesh - 04-10-15

‘जब नेताजी रूठ गए...’
कुछ माह पूर्व पैदा हुए पार्टी परिवार मे ग़म पसरा है। ठीक से बड़ा भी न हुआ था कि एक अहम अंग रूठकर बिछड़ गया है। हाहाकार मचा हुआ है। हाय! हाय! ये क्या हो गया! नेताजी ने स्वयं को गठबंधन से मुक्त क्या किया, सारे मंसूबों पे पानी फिरता दिख रहा है। परिवार की हालत मृतक आश्रित सी हो गयी है। सबके मन मे एक ही सवाल है। नेताजी ने ऐसा क्यों किया? किया सो किया, किन्तु अपनी ही बिरादरी के साथ क्यों किया? गठबंधन के चन्दन से अपना भाग्य महकाने वाले आज क्रंदन कर रहे हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि सर्प और चन्दन का मेल नहीं होता। यदि नेताजी ऐसा नहीं करते तो कैसा करते? जिसे तलाक़ लेने का अनुभव परस्पर रहा हो, वह भला शादी जैसे भरोसे से कबतक बंधा रहेगा? ऐसा नहीं करने पे वे नेता किस मुंह से कहलाते? इनलोगों को ये समझ नहीं आता है कि उन्हें दल बदलने की ‘अच्छी बीमारी’ है। इसके अंदरूनी एवं बाहरी, कई अज्ञात कारण होते हैं। अक्सर नेताओं की अच्छी बीमारियों के ‘कारण’ अज्ञात ही होते हैं। दवा-दारू खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर, ‘लॉन्ग-टर्म’ रिस्क भी ‘मैनेज’ करना है उन्हें।
कुछ कह रहे हैं कि अनर्थ हो गया। इतने पापड़ बेलने के बाद शत्रु के शत्रु मित्र हुए थे। कम से कम ज़माने को दिखाने के लिए तो हुए ही थे। विपक्षी दल की ‘मोनोपोली’ हुई जा रही है। जब किसी बड़े ‘गैंगस्टर’ को ठिकाने लगाना हो, तो आपस मे घोर शत्रुताधर्म के निर्वाहक ‘छुटभैये चोर-उचक्कों’ का साथ आना लाज़िमी है। मुझे इस प्रकार की एकता बड़ी अच्छी लगती है। भरोसा जाग उठता है कि ‘फूट’ पड़ना ही नियति है। मन मार कर राजनीति के ‘बेचारों’ ने हाथ मिलाया था। पहले से मृत पड़े अपने ज़मीर की बारंबार हत्या के पश्चात तो गठबंधन हुआ था। फूल-माला, फोटो-सेल्फी आदि के साथ नेताजी को गठबंधन परिवार का मुखिया नियुक्त किया था। मगर परिवार पे नेताजी के ‘हृदयपरिवर्तन’ का पहाड़ टूट गया। नेताओं का हृदपरिवर्तन पूर्वनियोजित (प्री-प्लान्ड) होता है। यथोचित समय पर उनकी ज़ुबान से इस परिवर्तन की सूचना आती है। हमे लगता है कि सब ‘अचानक’ होता है।
सुना कि नेताजी सीटों के बँटवारे के चलते रुष्ठ हो गए। कह रहे थे, ‘मुखिया हमे बनाया, तो लड़ने हेतु सबसे ज़्यादा सीट हमे ही मिलनी चाहिए थी...पूरे गठबंधन का बोझ हमपे डाल दिया...सीटों का भार हल्का कर दिया...’ गठबंधन की ज़मीन हिल गयी है। उसके ‘शेषनाग’ ने रुष्ठता का मिश्रण करके मदिरापान किया है। ज़मीन को उसी के हाल पे छोड़ दिया है। झूमते हुए गा रहे हैं, ‘इतना न मुझपे ऐतबार करो, मैं नशे मे हूँ...’
गठबंधन की धरती हिली तो गठबंधनीय दलों के मुखिया लुढ़कते हुए अपने ‘सांप’...सॉरी, ‘नाग’...सॉरी, ‘शेषनाग’ के पैरों पे आकर टिक गए। राजनीति मे किसी के भी पैरों पे टिकना सम्मानजनक होता है। यहाँ थूक कर चाटने वाला ही श्रेष्ठ पद पे विराजता है।
एक दल के मुखिया, नेताजी के पैरों पे टिककर संभलते हुए बोले, ‘अरे महाराज! वोटिंग के आखिरी चरण तक तो रुक जाते...सब आपके चरणों मे पड़े हैं...कुछ नहीं तो रिश्तेदारी का ही ख्याल किया होता! बिना प्रकाश वाले इस प्रदेश मे आपकी साइकिल को अंधेरे मे रास्ता तो हमारी लालटेन ही दिखाती न! सीट की ज़रा सी बात पे आप नाता तोड़ रहे हैं...’ नेताजी बोले, ‘बात सीट की नहीं, हमारे सम्मान की है...’
‘नेता होकर आप सम्मान की बात करते हैं...आपकी सोच पर तरस आता है...’
‘हाँ, कम सीटों पे चुनाव लड़ना हमारे सम्मान के विरुद्ध है...’
‘आप फिर सम्मान-सम्मान रटने लगे... जैसे हिन्दी के साहित्यकार को साहित्य मारता है, वैसे ही ये सम्मान हमे ले डूबेगा...’
‘क्या मतलब?’ नेताजी गुर्राए।
‘मैं कहता हूँ कि जिस वस्तु की आवश्यकता नहीं है, उसके मोहपाश मे क्यों फँसते हैं? भला हमे सम्मान से क्या लेना-देना? सम्मान वाले पंछी राजनीति के आसमान मे ऊंचा नहीं उड़ पाते...’
नेताजी थोड़ी देर चुप रहे। ‘पैर-पड़ू’ मुखिया को कोने मे ले जाकर बोले, ‘सिर्फ सीटों की बात नहीं है...कल को चुनाव मे विजयी हुए, तो ये लोग मुझे दूसरे प्रदेश का कहेंगे...’ इसपर मुखियाजी बोले, ‘तब आप समर्थन खींच लेना...कोई नई बात तो है नहीं...’
‘लेकिन...’
‘लेकिन-वेकिन कुछ नहीं...साथ चलना ही होगा...’
देखो बंधु, तुम राजनीति के पुराने चावल हो...सब समझते हो... हम नहीं जा सकते...’
‘पका हुआ तो हूँ... इसलिए अब बता दीजिए कि असली माजरा क्या है’?
नेताजी धीरे से बोले, ‘अब तुम जैसे अनुभवी आदमी, ओह माफ करना...अनुभवी नेता से क्या छिपाना...दरअसल हमसे अपनी ही सरकार नहीं संभाल जा रही है...मुझे और तमाम अपने लोगों पर ही सीबीआई की जांच बैठी हुई है...तो...’
‘बस-बस’ मुखियाजी उन्हें टोकते हुए बोले, ‘मैं आपका दुख समझता हूँ...आप जाना चाहते हैं...शौक से जाइए...हम सबसे कह देंगे कि शौक बड़ी चीज़ है...’

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