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Thursday, 29 October 2015

बस कर पगले , रुलाएगा क्या....

बस कर पगले , रुलाएगा क्या....
बिहार मे कोसी नदी के किनारे एक गाँव हैं। आजकल ‘डबल’ बाढ़ग्रस्त है। पानी के साथ-साथ नेताओं की बाढ़ भी आयी है। आम आदमी ज़्यादा हाय तौबा नहीं मचाता। वह तो बस किसी तरह किनारे लगना चाहता है। किनारे लगे एक मित्र ने फोन पे बताया कि वहाँ तो मेला लगा हुआ है। सिर के ऊपर हेलिकॉप्टर मच्छरों की तरह मंडरा रहे हैं। भाषण, वादे और तंज़ का मिश्रित ‘रॉक संगीत’ तार सप्तक मे बज रहा है। पानी के अंदर डुबकी लगाओ, तो भी गायन-वादन की भनभनाहट सुनाई देती है।
दुष्यंत संभवतः इसीलिए लिख गए थे- “ये रोशनी है हक़ीक़त मे एक छल लोगों, कि जैसे जल मे झलकता हुआ महल लोगों।” चुनाव होता है तो मेला ही लगता है। रोशनी होती है। चमक-धमक होती है। गरीबी-भुखमरी की नुमाइश लगती है। गरीबी-भूखमरी के जनक और उसका लालन-पोषण करने वाले ही उन्हें ख़रीदते हैं।
‘प्रलोभनों’ का ‘एक्स्चेंज ऑफर’ भी राजनीति के बाज़ार को गरम किए हुए है। मुआवज़े और अला-फलां पैकेज एक्स्चेंज मे देकर गरीबी ख़रीदने का सफल प्रयास सतत जारी है। अपने मित्र को सावधान करते हुए मैं बोला, ‘प्यारे! बचके रहना...उन्हीं हेलिकॉप्टरों से ‘खून-चूसक’ प्राणी उतरेंगे। तुम्हारे आसपास पास नाचेंगे। तुम्हारा मनोरंजन करेंगे। मौका पाते ही तुम्हारे ‘भ्रम का भंजन’ भी करेंगे। प्रलोभन का तगड़ा डंक मारेंगे। तुम फिर से पाँच वर्ष के लिए तड़पोगे...हो सकता है सरकारी पंचवर्षीय योजना की भांति, तुम अपने जीवन का कार्यकाल पूरा करने से पूर्व ही परलोक सिधार जाओ... तुम ख़त्म हो जाओगे...वे कहेंगे हम गरीबी मिटाने को प्रतिबद्ध हैं...देखो एक गरीब कम हुआ।
मित्र हंसा। मुक्तिबोध स्टाइल मे बोला, ‘कोई नई बात करो पार्टनर...’ उसने एक स्थान का हाल सुनाया। नेताजी आगामी चुनावों के मद्देनज़र, ‘प्रलोभन-पिटारा’ खोले बैठे थे। ये प्रलोभन-पिटारा केवल खुलता है। कभी खाली नहीं होता है। ज़रा सा भी नहीं। बस अपनी चमक बिखेरता है। जनता की आँखें चौंधिया जाती हैं। ‘आस’ की मारी जनता ‘एक बार और सही’ कहकर वोट देने का प्रयास करती है। चुनावोपरांत पिटारा स्वतः बंद हो जाता है। नेता रूपी मदारी जनता से कहता है, ‘चल री बंदरिया...अब खेल खतम, पैसा हज़म...एकदूसरे को न तू जाने न हम...’ वहाँ नेताजी मीडिया संग जनता को दाना फेंकते हुए बोले, ‘मेरे प्यारे! दुलारे! खेवनहारों, मेरे बिहारी भाइयों! विजयी होने पर हम बिहार को ‘बैंगलोर’ बना देंगे। चारों ओर स्मार्ट सिटी नज़र आएंगे। पढ़ने वाले बच्चों को साइकिल नहीं, बल्कि स्कूटी देंगे। कॉपी-किताबें नहीं, वरन लैपटॉप देंगे। वादा है... बिहार से गरीब और गरीबी का नामोंनिशान मिटा देंगे...बस शर्त ये है कि हम जीत जाएँ...’
एक आदमी चुपचाप भाषण सुन रहा था। मुझे समझदार लगा। हमारे सभ्य समाज मे चुप रहकर, सिर्फ सुनना समझदारी और शराफत की निशानी है। लेकिन बाद मे उसने अपनी समझदारी उतार फेंकी। बेधड़क मंच पे चढ़ गया। जब आदमी को भरोसा हो जाता है कि अब ‘धड़कन’ बंद ही होनी है, तो वह ‘बेधड़क’ हो जाता है। चढ़ते ही उसने माइक पर से नेताजी का एकछत्र राज छीन लिया। बोला, ‘हे महाराज!, आप हमारे बारे मे इतना सोच रहे हैं...आपका बारंबार धन्यवाद...आप हम सबके प्यारे हैं...मैं तो कहूँगा कि हमारी क्या औकात? आप तो भगवान को भी प्यारे हैं...अभी नहीं है...तो जल्द ही होंगे! मगर माननीय! आप से विनती है। सिटी की सीटी न बजाएँ। स्मार्ट तो हम अच्छी खेती करके भी बन जाएंगे। बस अब ज़मीनें छोड़ दें। चारा खाकर आप अपनी महानता कम न करें। चारा हमारे मवेशी खाएँगे। आप छप्पन भोग का आस्वादन करें। हमारे होनहार बच्चे निकलते तो स्कूल के लिए ही हैं, मगर उनका स्कूल अक्सर ‘अनुपस्थित’ रहता है। कॉपी-किताबें तो खैर बाबुओ-टीचरों का ‘मिड-डे-मील’ बन जाती हैं। अतः हे दयाखिचान! आप लैपटॉप न दें। बस बिजली ‘छोड़’ दें...या तो बिहार मे जान आ जाएगी, या बची-खुची भी चली जाएगी। आपकी सुकुमार स्कूटी हेतु हमारी सड़कें अछूत हैं। यदि स्कूटी आई तो उसके नट-बोल्ट बिहार की भांति ढीले पड़ जाएंगे। उसमे ईधन डालने हेतु धन चाहिए होगा। आपकी वेतनवृद्धि पहले ही रुकी हुई है। मैं आपका कष्ट समझता हूँ। धन के लिए रोजगार चाहिए, मगर वो भी नहीं है। तो हम नहीं चाहते कि आपकी स्कूटी मात्र अपहरण-फिरौती के ईधन पे चले। हे विघ्नकर्ता! आप कष्ट न उठाएँ। हम गरीब हैं। स्वयं को आसानी से खत्म कर लेंगे। गरीब और गरीबी का नामोंनिशां मिट जाएगा। आप बस प्रसन्न रहें...
पता नहीं नेताजी ‘प्रसन्न’ हुए या ‘सन्न’ रह गए। बस अपनी डबडबाती आँखों से इतना बोले, ‘बस कर पगले, रुलाएगा क्या’?
                     -अभिषेक अवस्थी

Tuesday, 6 October 2015

MP Jansandesh - 04-10-15

‘जब नेताजी रूठ गए...’
कुछ माह पूर्व पैदा हुए पार्टी परिवार मे ग़म पसरा है। ठीक से बड़ा भी न हुआ था कि एक अहम अंग रूठकर बिछड़ गया है। हाहाकार मचा हुआ है। हाय! हाय! ये क्या हो गया! नेताजी ने स्वयं को गठबंधन से मुक्त क्या किया, सारे मंसूबों पे पानी फिरता दिख रहा है। परिवार की हालत मृतक आश्रित सी हो गयी है। सबके मन मे एक ही सवाल है। नेताजी ने ऐसा क्यों किया? किया सो किया, किन्तु अपनी ही बिरादरी के साथ क्यों किया? गठबंधन के चन्दन से अपना भाग्य महकाने वाले आज क्रंदन कर रहे हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि सर्प और चन्दन का मेल नहीं होता। यदि नेताजी ऐसा नहीं करते तो कैसा करते? जिसे तलाक़ लेने का अनुभव परस्पर रहा हो, वह भला शादी जैसे भरोसे से कबतक बंधा रहेगा? ऐसा नहीं करने पे वे नेता किस मुंह से कहलाते? इनलोगों को ये समझ नहीं आता है कि उन्हें दल बदलने की ‘अच्छी बीमारी’ है। इसके अंदरूनी एवं बाहरी, कई अज्ञात कारण होते हैं। अक्सर नेताओं की अच्छी बीमारियों के ‘कारण’ अज्ञात ही होते हैं। दवा-दारू खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर, ‘लॉन्ग-टर्म’ रिस्क भी ‘मैनेज’ करना है उन्हें।
कुछ कह रहे हैं कि अनर्थ हो गया। इतने पापड़ बेलने के बाद शत्रु के शत्रु मित्र हुए थे। कम से कम ज़माने को दिखाने के लिए तो हुए ही थे। विपक्षी दल की ‘मोनोपोली’ हुई जा रही है। जब किसी बड़े ‘गैंगस्टर’ को ठिकाने लगाना हो, तो आपस मे घोर शत्रुताधर्म के निर्वाहक ‘छुटभैये चोर-उचक्कों’ का साथ आना लाज़िमी है। मुझे इस प्रकार की एकता बड़ी अच्छी लगती है। भरोसा जाग उठता है कि ‘फूट’ पड़ना ही नियति है। मन मार कर राजनीति के ‘बेचारों’ ने हाथ मिलाया था। पहले से मृत पड़े अपने ज़मीर की बारंबार हत्या के पश्चात तो गठबंधन हुआ था। फूल-माला, फोटो-सेल्फी आदि के साथ नेताजी को गठबंधन परिवार का मुखिया नियुक्त किया था। मगर परिवार पे नेताजी के ‘हृदयपरिवर्तन’ का पहाड़ टूट गया। नेताओं का हृदपरिवर्तन पूर्वनियोजित (प्री-प्लान्ड) होता है। यथोचित समय पर उनकी ज़ुबान से इस परिवर्तन की सूचना आती है। हमे लगता है कि सब ‘अचानक’ होता है।
सुना कि नेताजी सीटों के बँटवारे के चलते रुष्ठ हो गए। कह रहे थे, ‘मुखिया हमे बनाया, तो लड़ने हेतु सबसे ज़्यादा सीट हमे ही मिलनी चाहिए थी...पूरे गठबंधन का बोझ हमपे डाल दिया...सीटों का भार हल्का कर दिया...’ गठबंधन की ज़मीन हिल गयी है। उसके ‘शेषनाग’ ने रुष्ठता का मिश्रण करके मदिरापान किया है। ज़मीन को उसी के हाल पे छोड़ दिया है। झूमते हुए गा रहे हैं, ‘इतना न मुझपे ऐतबार करो, मैं नशे मे हूँ...’
गठबंधन की धरती हिली तो गठबंधनीय दलों के मुखिया लुढ़कते हुए अपने ‘सांप’...सॉरी, ‘नाग’...सॉरी, ‘शेषनाग’ के पैरों पे आकर टिक गए। राजनीति मे किसी के भी पैरों पे टिकना सम्मानजनक होता है। यहाँ थूक कर चाटने वाला ही श्रेष्ठ पद पे विराजता है।
एक दल के मुखिया, नेताजी के पैरों पे टिककर संभलते हुए बोले, ‘अरे महाराज! वोटिंग के आखिरी चरण तक तो रुक जाते...सब आपके चरणों मे पड़े हैं...कुछ नहीं तो रिश्तेदारी का ही ख्याल किया होता! बिना प्रकाश वाले इस प्रदेश मे आपकी साइकिल को अंधेरे मे रास्ता तो हमारी लालटेन ही दिखाती न! सीट की ज़रा सी बात पे आप नाता तोड़ रहे हैं...’ नेताजी बोले, ‘बात सीट की नहीं, हमारे सम्मान की है...’
‘नेता होकर आप सम्मान की बात करते हैं...आपकी सोच पर तरस आता है...’
‘हाँ, कम सीटों पे चुनाव लड़ना हमारे सम्मान के विरुद्ध है...’
‘आप फिर सम्मान-सम्मान रटने लगे... जैसे हिन्दी के साहित्यकार को साहित्य मारता है, वैसे ही ये सम्मान हमे ले डूबेगा...’
‘क्या मतलब?’ नेताजी गुर्राए।
‘मैं कहता हूँ कि जिस वस्तु की आवश्यकता नहीं है, उसके मोहपाश मे क्यों फँसते हैं? भला हमे सम्मान से क्या लेना-देना? सम्मान वाले पंछी राजनीति के आसमान मे ऊंचा नहीं उड़ पाते...’
नेताजी थोड़ी देर चुप रहे। ‘पैर-पड़ू’ मुखिया को कोने मे ले जाकर बोले, ‘सिर्फ सीटों की बात नहीं है...कल को चुनाव मे विजयी हुए, तो ये लोग मुझे दूसरे प्रदेश का कहेंगे...’ इसपर मुखियाजी बोले, ‘तब आप समर्थन खींच लेना...कोई नई बात तो है नहीं...’
‘लेकिन...’
‘लेकिन-वेकिन कुछ नहीं...साथ चलना ही होगा...’
देखो बंधु, तुम राजनीति के पुराने चावल हो...सब समझते हो... हम नहीं जा सकते...’
‘पका हुआ तो हूँ... इसलिए अब बता दीजिए कि असली माजरा क्या है’?
नेताजी धीरे से बोले, ‘अब तुम जैसे अनुभवी आदमी, ओह माफ करना...अनुभवी नेता से क्या छिपाना...दरअसल हमसे अपनी ही सरकार नहीं संभाल जा रही है...मुझे और तमाम अपने लोगों पर ही सीबीआई की जांच बैठी हुई है...तो...’
‘बस-बस’ मुखियाजी उन्हें टोकते हुए बोले, ‘मैं आपका दुख समझता हूँ...आप जाना चाहते हैं...शौक से जाइए...हम सबसे कह देंगे कि शौक बड़ी चीज़ है...’

Monday, 17 August 2015

‘बड़े दिनों के बाद, आयी वतन की याद...’



‘बड़े दिनों के बाद, आयी वतन की याद...’
हर वर्ष की तरह, इस वर्ष भी स्वाधीनता दिवस के मंच पे ‘स्वतंत्र’ होने के ‘नाटक’ की तैयारियां चल रही हैं। कलाकार अभी पर्दे के पीछे हैं। कोई गांधी बनने के लिए लुंगी लपेट रहा है। कोई नेहरू बनने के लिए गुलाब ढूंढ रहा है। नेता जितने भी थे, सब टाइड की सफेदी का विज्ञापन करने वाले हैं। शहीद होने वाले लोग मिट्टी मे मिलेंगे, सो उन्होने लाल रंग वाली मिट्टी लपेट रखी है। बैकड्रॉप मे भारत माता चुपचाप खड़ी हैं। हाथों मे तिरंगा लिए हैं। दोनों हिलडुल भी नहीं रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानों किसी सरकारी अस्पताल के आईसीयू के अंदर, वेंटीलेटर पे टिके हों। हालांकि वे स्वतन्त्रतापूर्वक ‘नाटक’ के ‘निर्देशकों’ के आधीन हैं, और आदेश का पालन करना उनकी विवशता है। नाटक शुरू होने का समय तो हो गया है, किन्तु अभी मुख्य अतिथि नहीं पधारे हैं। ‘कलाकारों’ को उनकी ‘स्लो’ आदत का पता है, सो वे इतमिनान ने ‘फास्टफूड’ ढकोलने मे लगे हैं। निर्देशक खुश हैं क्योंकि वे बिल बढ़ाकर मुख्य अतिथि को देंगे। मुख्य अतिथि उसमे वृद्धि करके, आगे वाले डिपार्टमेन्ट मे सरका देंगे। बिल बढ़ता जाएगा। नाटक का कुछ भाग यूं ही बढ़े हुए बिल द्वारा फ़ाइनेंस हो जाएगा।
इस मौके के मद्देनज़र, सुरक्षा चाक-चौबन्द है। मजाल नहीं कि परिंदा पर भी मारे। अगर मारेगा, तो मार दिया जाएगा। आज स्वतन्त्रता दिवस है, लेकिन उड़ने की आज़ादी परिंदे को भी नहीं है। तमाम अतिथि आने लगे हैं। बीएमडबल्यू, ऑडी जैसी गाड़ियों की कतारें मुख्य द्वार पे लगी हैं। सूट, पैंट, टाई, और खादी के चमचमाते परिधानों के अंदर घुसे दर्शक गंभीर मुद्रा लिए उतर रहे हैं। देखने से ही पता चल रहा है कि उनकी जांच की आवश्यकता नहीं हैं। वे स्वतंत्र जो हैं। हाँ, उनके ड्राइवरों को कड़ी जांच से गुज़रना पड़ रहा है। वहीं से एक किसान, एक मज़दूर और एक भिखारी गुज़र रहे थे। उन्हें भी पता था कि वर्षाऋतु मे लोगों के अंदर देशभक्ति के बादल उमड़ते हैं। और महीने के बीचोंबीच बरस पड़ते हैं। उनके अंदर स्वतन्त्रता का भाव जागा। कौतुहूल के साथ नाटक वाली जगह को देखने लगे। सोच रहे थे कि वे भी नाटक देखलें। देखलें कि ये ‘स्वतन्त्रता वाले’ आखिर हर वर्ष कैसा ‘नाटक’ करते हैं। वे इस भ्रम मे थे कि नाटक स्वतन्त्रता पर है, तो वे भी उसका मंचन स्वतंत्रतापूर्वक देख सकते हैं। अक्सर अमीरों के बीच कोई गरीब खड़ा होता है तो वह स्वयं को अपराधी सा मान लेता है। नज़रें चुराने लगता है। तीनों लजाती नज़रों के साथ गेट की ओर गए। सुरक्षाकर्मियों ने टिकट मांग लिया। टिकट तो उनके पास था नहीं, सो लजाती नज़रें और गड़ गईं। बेचारे ‘टिकटीय रूप’ से स्वतंत्र न थे।
इतने मे मुख्य अतिथि की लैंडरोवर आ गयी। सुरक्षाकर्मी सतर्क हो गए। किसान, मजदूर और भिखारी वहाँ से हटने लगे। किन्तु सुरक्षाकर्मियों मे मुस्तैदी का आधिक्य हो चुका था। उन्होने अपनी मुस्तैदी का प्रदर्शन तीनों पे लठियाँ भांजकर कर दिया। मुख्य अतिथि यह देख अंदर ही अंदर खुश हो गए। उनके सलाहकार ने उन्हें कान मे कुछ कहा, तो वे मुस्कुरा दिए। पहले वे भी नुक्कड़ नाटक किया करते थे। किन्तु जबसे ‘ऊपर’ उठे हैं, अत्यधिक ‘नाटकीय’ हो गए हैं। उन्होने सुरक्षाकर्मियों को तुरंत रोकते हुए कहा कि उन तीनों को अंदर जाने दिया जाए। टिकट का पैसा ‘खाने’ के बिल मे जोड़ दिया जाए। किसान, मज़दूर और भिखारी खुश हुए। तीनों अंदर घुसे और सबसे पीछे खड़े हो गए। मुख्य अतिथि अपना भाषण शुरू करने ही वाले हैं कि अचानक किसान के मोबाइल मे किसी का फोन आया। पेट जब भूखा हो तो डाइटिंग की नियमावली किसी को याद नहीं रहती। गरीबी मे इंसान दुनियादारी की नियमावली भूल सा जाता है। उसके फोन की रिंगटोन की आवाज़ उतनी ही बुलंद है, जितनी भारत मे गरीबी बुलंद है। सबका ध्यान उसकी रिंगटोन पे जाता है। जहां बज रहा था – ‘चिट्ठी आयी है, आयी है, चिट्ठी आयी है…बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद वतन की  मिट्टी आयी है...’  
                 -अभिषेक अवस्थी



Wednesday, 1 July 2015

जुलाई 2015 की कादंबिनी मे प्रकाशित

Monday, 8 June 2015

Amar Ujala
स्वप्नलोक मे शिवजी, ताजमहल और मैं! (परिवर्धित लेख)
मैं सरकार की भांति सत्ता के पालने मे गहरी नींद के आगोश मे था। न जाने कब स्वप्नलोक मे विचरण हेतु पहुँच गया। यकायक मुझे भगवान शिव मेरी ओर आते दिखे। मेरी आश्चर्यमय प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही न रहा। न तो मैं प्रतिदिन मंदिर जाता हूँ। न ही सोमवार को शिवलिंग पे दूध बहाता हूँ। बावजूद इसके, भोलेभंडारी मुझे दर्शन दे रहे हैं। कलयुग मे मेरे जैसे सामान्य मनुष्य को भगवान के दर्शन होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। मैंने तो पुण्य टाइप कोई ‘कांड’ भी नहीं किया। अंजाने मे ही सही, पापी तो मैं भी हूँ। लगता है भगवान(नों?) को भी जनता की प्रवृत्ति सी हो चली है। जैसे जनता हर बार कम भ्रष्टाचारी को अपना नेता चुनती है, वैसे ही भगवान भी कम पापी को भक्त समझ बैठे।
समीप आते ही मैं भगवान के चरणों मे लोट गया। बोला- प्रभु! अहो भाग्य हमारे, जो आप पधारे। किन्तु प्रभु! आप तो भगवान हैं, अंतर्यामी हैं। आपका नेटवर्क तो ‘फाइव-जी’ से कहीं अधिक शक्तिशाली है। ऊपर से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा अपने ‘मन की बात’ कह देते। शिवजी रहस्यमयी मुस्कान ढीलते हुए बोले- ‘क्या करूँ पुत्र!, मनुष्यों के कारण जो अत्याचार और घृणा के काले-घने बादल छाए हैं, वे अब ब्रह्मांड मे भी अपने पाँव पसार रहे हैं। फलस्वरूप हमारे यहाँ भी नेटवर्क की भारी समस्या उत्पन्न हो गयी। इधर गुज़रते हुए त्रिनेत्र ने वाईफाई के तगड़े और फ्री नेटवर्क के संकेत दिए।
उनकी रहस्यमयी मुस्कान देख मैंने पूछा- हे पालनहार! क्या हुआ? आप इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जो छुपा रहे हो? 
वे बोले- ‘पुत्र! क्या बताऊँ। जैसे ही मेरी जटाओं ने वाईफाई का नेटवर्क पकड़ा, भारतभूमि से जुड़ी अनगिनत अधिसूचआएँ मेरे मन-मष्तिष्क की घंटी प्रतिपल बजा रहीं हैं। इतनी घन्टियां तो मैने किसी सोमवार अथवा शिवरात्रि मे भी नही सुनी’। मैने कहा- किंतु प्रभु! आपको तो प्रसन्न होना चाहिए न। भक्तों की तादात जितनी बढ़े, उतना अच्छा। आजकल इन्द्रदेव फ़िर से अनियंत्रित हो रहे हैं। इधर सरकार और उधर से वर्षा का हाहाकार। न जाने कितनी ही घन्टियां तो इस देश के किसान ही बजा रहे होंगे। जो बजाते-बजाते थक गए, इन्द्रदेव से प्रत्यक्षतः निपटने स्वर्गलोक निकल गए। शंकर जी सीरीयस मोड मे आ गए। बोले- ‘बात वो नही है। किसान तो सदैव ही परेशान रहता है। इसमे इन्द्र को मत घसीटो’। मैने कहा- तो ठीक है प्रभु मुद्दे पे आइए। कहने लगे- दरसल, वाईफाई ऑन होते ही यकायक अजीब से नोटिफिकेशन आए। अच्छा खासा ताजमहल बना हुआ है। उसके नीचे मेरे होने की बात कही जा रही है। मैं तो सर्वत्र हूँ। अनावश्यक चक्करों मे मुझे फँसाया जाता है। चिंता तो होगी ही न? विद्यालयों मे इतना रटाया जाता है कि भैया ईश्वर-अल्लाह सब एक हैं। किंतु न! तुमलोगों को कुछ याद ही कहाँ रहता है। कभी बाबरी, कभी शिवमंदिर, कभी राममंदिर। बस कोई न कोई बहाना चाहिए लड़ने का। लाइमलाइट मे रहने का। अब ताजमहल को ही लपेटे लिया। अरे भाई, इतनी ख़ूबसूरत इमारत है। सब मिलकर उसके जैसा सुंदर हृदय रखो। और फ़िर ताजमहल के अंदर मैं हूँ या मेरे अंदर ताज, बात तो समान ही रहेगी कल और आज’।
इससे पहले कि प्रभु गुस्से मे तांडव जैसा कुछ कर बैठते, मैने मामला सम्भालते हुए कहा- अब आप ही कुछ उपाय बताएँ प्रभु! वे बोले- उपाय अत्यंत सरल है। 'धर्मगुरुघंटालों' और नेताओं को चाहिए कि शांति'स्वरूप' और  प्रेम'योगी' बनकर जीवन का असल ‘आनंद’ लें और सबको दें। सौहार्द और सहयोग को 'साक्षी' मानकर 'आज़म-ए-ओवैसी' कहलाएं। 
शंकरजी की बातें सुनकर मुझे लगा कि कहीं वे भावुकता मे बह न जाएँ। मैने उन्हें बीच मे रोक कर कहा- हे प्रभु! ये नामुमकिन है। हमारे यहाँ इंसान को बनाने वाले भगवान बदले जाते हैं। इंसान नही बदले जाते है। आपको कोई ठोस क़दम ही उठाना होगा। इतना सुनते ही भोलेनाथ ने नन्दी को आवाज़ लगायी और जाने को तैयार हुए। भगवान कब ठोस क़दम उठाएंगे, ये न पता चला किंतु नन्दी ने मुझपे एक लात देमारी और मुझे स्वप्न्लोक से बाहर फेंक दिया।
                                  -अभिषेक अवस्थी



Thursday, 4 June 2015

नई दुनिया - अधबीच 04-06-15
ये आरक्षण का जिन्न जब तब बोतल से बाहर निकल आता है। सरकार अलादीन की भांति इसे तमाम जद्दोजहद करके हर बार बोतल मे बंद करती है। परंतु ये है कि गुलामी पसंद नहीं करता है। अपने चाहने वालों की सहायता से यह हर बार बोतल का ढक्कन खोल, कुछ तूफानी करने को आतुर हो जाता है। इस जिन्न का ‘इस्तेमाल’ करने वाले सहायक नाम के प्राणी भी कम नही हैं। जब-जब इनको लगता है कि मेहनत, शिक्षा और पराए सुख से इन्हें कष्ट है, तब-तब ये आरक्षण के जिन्न को ‘पेरोल’ पे आज़ाद करवाते हैं। तदुपरान्त रेलवे की पटरियों पे ये दोनों मिलकर अपना तांडव करते हैं। जिन्न को दूल्हे का रूप देकर अपने मतलब की घोड़ी को रेलवे ट्रैक पर दौड़ाते हुए, सरकारी दुल्हन तक पहुंचाया जाता है। प्रदर्शनकारी बारातियों को ये पूरा भरोसा रहता है कि भारत भर के रेलवे ट्रैक पर उनका मालिकाना हक़ है।
पिछले दिनों मैं भी एक ऐसे ही प्रसंग मे फंसा था। दरअसल हुआ यूँ कि जिस ट्रेन से मैं सफर कर रहा था, वह अचानक किसी वीरान जगह पे रुक गयी। रुकना कोई नई बात नहीं है। लेकिन किसी प्राइवेट अस्पताल की तरह साफ-सुथरे मौसम मे, एक सुपर फास्ट एक्सप्रेस ट्रेन का चार घंटे से ऊपर यथास्थान खड़े रहना अवश्य ही नयी बात है। अरे! एक रेलगाड़ी ही है न! कोई देश की गरीबी तो है नहीं कि जो अड़ियल बनकर एक ही स्थान पे टिकी रहे। न नीचे खिसकती है न ऊपर। मुई वहीं की वहीं धरी है। ख़ैर, जैसा की सदैव होता है, ट्रेन रुकते ही मेरी बोगी के अधिकांश ‘मर्द’ अपने माथे पे प्रश्नसूचक उभारते हुए नीचे उतार गए। ट्रेन रुकने पर मर्द अक्सर द्रुतगामी हो जाते हैं। वे आविलम्ब इंजन की ओर ऐसे लपकते हैं जैसे रेलवे का सम्पूर्ण अतलस्पर्शी ज्ञान उन्हें ही प्राप्त हो। कुछ महानुभाव तो इतना कॉन्फिडेंटली अपने क़दम इंजन की ओर बढ़ाते हैं, जैसे हर समस्या का निदान उनके पास ही उपलब्ध हो। गोया कि लोकोपायलट का पूरा कोर्स उन्होने आत्मसात किया है। यदि ड्राईवर बीमार हो गया तो वे ही गाड़ी ले उड़ेंगे। मैने भी अपना आलस्य त्यागा। मांजरा समझने हेतु खरामा-खरामा इंजन की ओर बढ़ा। पता चला कि कुछ प्रदर्शनकारी ट्रेन के आगे कटने को तैयार ‘पड़े’ थे। पास मे ही एक नौजवान प्रदर्शनकारी कोलड्रिंक पीता दिखा। समय बिताने के लिए मैंने उसे पकड़ा। सवाल जवाब शुरू हुए।
मैंने पूछा, ‘तुम तो अच्छे खासे नौजवान हो। मेहनत करो, पढ़ाई करो। उसके दम पे नौकरी पाओ। ये आडंबर क्यों?’
‘तो अभी भी तो मेहनत ही तो कर रहें हैं न बाबूजी...!’ युवक ने उत्तर मे कहा, ‘इत्ती धूप मे चेहरा लाल हुआ जा रहा है...जब औरों को आरक्षण मिल रहा है, तो हमारी बिरादरी को भी मिलना चाहिए न!’
‘इससे तुम्हें क्या फायदा क्या होगा?’
‘अजी! ज़ाहिर सी बात है...इत्ती रगड़म-रगड़ाई न करनी पड़ेगी। नंबर कम भी आएंगे तो आरक्षण को ढाल बनाकर नौकरी के चक्रव्युह को तोड़ देंगे...’
‘फिर तुम्हें आरक्षण मिलने के बाद, दूसरी बीरादरी वाले हल्ला मचाने लगेंगे,’ मैंने कहा।
वह बोला, ‘जी! मचाने दो हल्ला। वो भी मांगे आरक्षण...देखी जाए तो हम तो उनका भला ही करने निकले हैं जी...तुलसीदास कह गए हैं, “पर हित सरिस धर्म नहिं भाई” अर्थात...
‘इस पंक्ति का अर्थ मैं जानता हूँ’ मैंने उसे बीच मे रोकते हुए कहा, ‘तुमलोग स्वार्थी हो रहे हो... तुलसीदास जी तो यह भी कह गए हैं कि “पर पीड़ा सम नहिं अधमाई”। तुम्हारे कारण लाखों रेल यात्री व्यथित हैं। रेलवे का घाटा बढ़ रहा है...करोड़ों का नुकसान...’
‘ओ बाबूजी...’ इस बार बीच मे रोकने की बारी नौजवान की थी, सो वह बीच मे बोला, ‘ज़्यादा ज्ञान न बघारो... इत्ता ही ज़्यादा है तो सरकार मे बाँट दो... हम तो प्रदर्शन करते रहेंगे...दम हो तो ट्रेन हमारे ऊपर से ही चलवा दो...वरना बस पकड़ लो...ट्रेन तो हम न चलने देंगे जी...’
उसकी बातों का जवाब यही था कि मैं चुपचाप बस ही पकड़ लूँ। सोच रहा हूँ, तमाम रेलयात्रियों की ओर से रेल मंत्रालय को एक ‘रायनुमा’ पत्र लिखूँ। पत्र द्वारा मैं रेल मंत्रालय से विनम्र निवेदन करूंगा कि हर राज्य के हर शहर मे अलग से रेलवे ट्रैक का निर्माण हो। वहाँ कृत्रिम ट्रेनें चलें। एक अधिसूचना ज़ारी की जाए कि ये रेल ट्रैक सिर्फ और सिर्फ, प्रदर्शनकारियों के लिए विशेष रूप से निर्मित किया गया है। अतः, सभी छात्रनेताओं, किसाननेताओं, धर्मनेताओं, और प्रदर्शनप्रेमियों, को यह अधिकार है कि वे धरना और विरोध प्रदर्शन, जीत और हार प्रदर्शन, यहाँ तक कि जो अप्रदर्शनीय है, उसका भी प्रदर्शन करें। बाकी, चुनावकाल मे सरकार सबकी सुनती भी है, और वादों को ड्राफ्ट भी करती है।

Sunday, 19 April 2015

राजकुमार की घरवापसी...

राजकुमार की घरवापसी...
भले वे हार गए हों। भले ही उनकी गद्दी और साम्राज्य छिन गया हो। परंतु सत्य यही है कि तमाम लोगों के लिए वे अब भी एक राजकुमार ही हैं। वे स्वयं भी अपने कारनामों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से यही कहते रहे हैं। मीडिया से लेकर समर्थक और विरोधी, सब उनकी घरवापसी का जश्न अपने तरीके से मना रहे हैं। हो भी क्यों न। आखिर एक राजकुमार सत्ता से ‘विमुख’ होकर ‘तपस्योन्मुख’ हुआ। वह घोर तपस्या करने हाँगकाँग जैसे किसी चमकीले, तड़कीले एवं भड़कीले स्थान पर जो गया। यह कतई मज़ाक की बात नहीं कि तमाम शानोशौकत और मेनकाओं की उपस्थिति मे भी वह लगभग दो माह के लिए ‘ऋषि’ के रूप मे तपस्या करते रहे। बाकी ‘ये अंदर की बात है’। हम जैसे आम लोगो को जब देश के अंदर की बात नहीं ज्ञात नहीं होती तो भला विदेश मे क्या गुल खिलते हैं, इसका पता न कभी चल पाया था, न चल पाएगा। वो तो भला हो न्यूज़ वालों का कि ‘क्रिकेटर और उसकी गर्लफ्रेंड’ से फुर्सत मिलते ही उनके अदृश्य होने की तिथि, मिलने की तिथि और कारण समेत उसके बाद की स्थिति से हमे अवगत करवा दिया। महान लेखक शरद जोशीजी ने कहा है – ‘नियम की बात है कि हर तपस्या कुछ दिन बाद मज़े ज़रूर देती है।’ यह तय है कि मज़े मिलेंगे। यह बात दीगर है कि अब पाँच वर्ष प्रतीक्षारत रहना होगा। किन्तु मज़े मिलेंगे। क्योंकि मज़े देने वाले हम ‘आम-कुमार’ ही हैं। हमारे पास विकल्प कम होते हैं।
उनका लौटना एक चिंगारी सी है। बेरोज़गार हुए उनके समरर्थक रूपी कार्यकर्ता यकायक नौकरी बजाने निकल पड़े। गोया कि वे जीत सुनिश्चित करने का कोई फॉर्मूला लेकर लौटे हों। जो पटाखे ‘विजयावस्था’ मे फोड़ने का सपना था, वह तो पूरा न हुआ। दिवाली मे हार के गम के चलते पटाखे फोड़ने का मन न हुआ। विश्वकप ने भी मौका न दिया। लेदेकर अब मौका आया है। इससे पहले कि पटाखे एक्सपायर हो जाएँ उन्हे प्रयोग मे लाना ही होगा। सो सभी पिल पड़े। एक ऐसे ही विस्फोटक ‘समर्थक’ से मेरी भेंट हुई। मैंने जश्न का कारण पूछते हुए कहा – वे मात्र विदेश मे छुट्टियाँ व्यतीत कर के ही तो आए हैं। कौन सा इंद्रदेव को समझा कर आए है कि भारत के किसानों को बख्श दें? अथवा ऐसा क्या ले आए हैं कि चतुर्दिश उनके लौटने का ही चर्चा है? क्या वे अपने चिंतन और मंथन के थैले मे कालाधन वापस लाने की कोई सृदृढ़ योजना लाए हैं? वे बोले- ‘तब हारे तो हारे। यह दो महीने की तपस्या उनकी ‘नैतिक’ विजय है। उन्होने वहाँ जो चिंतन किया है, उसका मंथन अवश्य ही करेंगे। हम उसी का जश्न मना रहे हैं। इसमे आम लोगो का कोई स्थान नहीं है। अतः आप दूर रहें।’ मैं सदैव की भांति चुप रहा और खुश रहा। अपने घर की गली पकड़ कर मैंने घरवापसी तय करी।
घर लौटते हुए मैंने पाया कि कुछ विरोधी गुट के लोग भी नाच गाना कर रहे थे। वे भी पटाखे फोड़ रहे थे। अंतर यह थे कि समर्थकों के पटाखे बड़ी उदासीनता के साथ ऊपर जाकर बिना आवाज़ किए फूट रहे थे। विरोधियों के पटाखे दहाड़ते हुए फुट रहे थे। एक विरोधी से मैं पूछ बैठा, ‘भाई! राजकुमार तो उनके लौटे हैं। आप किस बात का जश्न बना रहे हैं? वह बोला – ‘जिनके कारण हमे गद्दी मिली है, जी वे लौट के घर आ गए हैं, तो खुशियाँ मनाना तो बनता है न! और वैसे भी अब वे आ गए हैं तो मीडिया वाले थोड़ा हंसी-ठिठोली भी कर लेंगे और कुछ दिन हमे चैन से रहने देंगे’।
मैंने सोचा कि बात तो बंदा सही कह रहा है। हंसी ठिठोली तो हो ही रही है। सारा फोकस किसानों की अत्महत्या, बर्बर व्यवस्था, लूट-मार, भ्रष्टाचार आदि से हटकर राजकुमार पे जो आ गया है।

                           -अभिषेक अवस्थी 

Tuesday, 30 December 2014

ठंड मे रेल यात्री और न्यूज़ एंकर...

ठंड मे रेल यात्री और न्यूज़ एंकर...
प्रतिदिन भिन्न-भिन्न न्यूज़ चैनलों के माध्यम से ज्ञात होता है कि वह दिन पिछले दशक मे सबसे ठंडा रहा। मुझे बड़ा ताज्जुब होता है कि जो न्यूज़चैनल परसों हुए बलात्कार के समाचार संग अपना तथाकथित आक्रोश दिखाते है, फिर दो दिन के पश्चात किसी क्रिकेटर और अभिनेत्री के रिश्तों पर अपना फोकस लौटा लाते हैं, वही न्यूज़ चैनल दस वर्ष पुराने आंकड़े भी सुरक्षित रखते हैं।
पिछले दिनों मैं कहीं जाने हेतु ट्रेन मे चढ़ा। ट्रेन को जबर्दस्त ठंड लगी हुई थी, सो बेचारी 12 घंटे विलंब से आई। चढ़ते ही ऐसा लगा जैसे संसद मे‘पक्ष’ गायब हो और ‘विपक्ष’ उपस्थित हो। अधिकतर सीटें खाली थीं और टीटी महोदय ‘उपचुनाव’ के यथोचित प्रत्याशी से यथासंभव लक्ष्मी वसूलने हेतु बोगी के दरवाजे पर जमे हुए थे। अपने शिकार को करीब आता देख वे चौकन्ने खड़े हो जाते, और अचानक सरकारी नौकर से ‘चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया’ की भूमिका मे आ जाते हैं। हमारे देश मे तीन लोग जब अपनी वर्दी मे होते हैं तो वे अमूमन स्वयं को ईश्वर-तुल्य मानते हैं। एक पुलिस का सिपाही, सरकारी डॉक्टर, और टीटी महोदय। ये प्राणी जब ‘ऑन ड्यूटी’ होते है तो अच्छे भले इंसान की ‘ब्यूटी’ बिगाड़ सकते हैं।
मैं बिस्तर लगा ही रहा था कि कोच मे धड़धड़ाते हुए एक न्यूज़ एंकर ऐसे घुसे जैसे टीवी पे एक दंतमंजन के विज्ञापन मे अदाकारा अपनी एंट्री मारती है। मुझे डर लगा कि कहीं वह एंकर मुझसे मेरे बंदरछाप दंतमंजन मे नमक होने के बारे मे पूछताछ न करने लगे। किन्तु जैसे काला धन आते-आते रुक गया, वैसे ही वो न्यूज़ एंकर अपने ‘विडियो जर्नलिस्ट’ के साथ दो बर्थ पहले ही रुक गया।
उसने पास बैठे बुज़ुर्ग से कहा, ‘चाचा, आप से कुछ प्रश्न करेंगे, फटाफट बिना बकलौली के उत्तर दीजिएगा।
चाचा भी कम न थे। ऐसे जवाब दिए कि ‘कपिलशर्मा’ भी उनके पैर पकड़ लें। बानगी पेश है-
एंकर: ये बताइये, ट्रेन लेट है क्या? कितना लेट है?
चाचा: आपने जांचा नहीं क्या? ऐसे ही हवा मे चढ़ गए। लेट है तभी तो आप से मिले, वरना घर मे आराम से सो रहे होते चारपाई पे।
एंकर: तो क्या परेशानी है आपको?
चाचा: जी गठिया का दर्द अपने चरम पे है।
एंकर: गठिया नहीं, ट्रेन लेट होने से जो परेशानी हुई, वो बताओ बुढ़ऊ।
चाचा: इत्ते कोहरे मे मरवाएंगे क्या? ड्राईवर अगर ट्रेन समय पर पहुंचाएंगे, तो हम यात्री घर की बजाय हरिद्वार जाएंगे। ट्रक के पीछे पढ़ा नहीं क्या आपने- धीरे चलोगे - घर मिलेगा, तेज़ चलोगे - हरिद्वार मिलेगा। ठीक ही है जो लेट है। आजकल तो विमान गायब हो रहे हैं, फिर ये ट्रेन कम से कम आई तो है। देर आए पर दुरुस्त आए।
मनमुताबिक उत्तर न पाने के कारण एंकर आगे बढ़ गया। कुछ ऐसे प्रश्न किए कि यात्री और हलकान हो गए। मसलन, आप कहाँ जा रहे हैं? क्या लगता है कि ट्रेन इतनी लेट कैसे हुई? क्या इसका मुख्य कारण मौसम है या कोई सरकारी वजह? जब आपको पता था कि इस समय मौसम खराब रहता है तो इसी ट्रेन से आरक्षण क्यों करवाया? क्या जाना ज़रूरी था? किससे मिलने जा रहे हैं? क्या पहले कभी सोचा था कि ट्रेन इतनी लेट हो सकती है?
यदि आप कोई रेल यात्रा करने वाले हों तो उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर अपनी पूर्वनियोजित यात्रा की भांति ही पूर्व-सू-नियोजित कर लें। क्या पता आपकी बोगी मे भी कल कोई रिपोर्टर घुस आए और आप पर बंदूक की तरह अपना माइक तान दे। तत्पश्चात आपके जले पे देश का नमक न सिर्फ छिड़के,वरन उड़ेल भी दे।    
                            -अभिषेक अवस्थी

Tuesday, 26 August 2014

जाएँ तो जाएँ किधर, हाय! रे सीरियल किलर...

जाएँ तो जाएँ किधर, हाय! रे सीरियल किलर...
अरे! आप नाहक न घबराएँ। मैं किसी क्रमिक हत्यारे की बात नहीं कर रहा हूँ। ऐसे लोग तो भारत मे ज़ाबज़ा पाए जाते हैं। कुछ ‘खादीधारक’ और महंगाई डायन उन्हीं मे से एक है। अब तो प्याज़ और टमाटर ने भी आमजन के स्वाद की हत्या कर दी है। ये उन्हीं को नसीब है, जिनके गाल लाल होते हैं। 
खैर, टमाटर-प्याज़ की मूल्यवृद्धि तो किसी बड़े नेता की संपत्ति की भांति, वर्षानुवर्ष घटित होने वाली  एक सामान्य घटना है। यहाँ बात हो रही है घर घर मे चल रहे (या यूँ कहें कि बस रहे) परम (अ)पूजनीय हाफिज़ और बगदादी से ज़्यादा ख़तरनाक ‘सिरियल किलर’ की। ये हमारे आपके घरों मे ऐसे कुंडली मारे बैठा है, जैसे कोई आम साँप किसी नागमणि को दबाये बैठा हो। हम जैसे कलमघिस्सुओं को बुद्धू बक्से (टी.वी.) मे दिखाए जा रहे ये ‘डेली सोप्स’ बड़े जानलेवा लगते हैं।
कभी कभार तो मुझे लगता है कि विद्यार्थियों को इतिहास के कुछ पाठ पढ़ाने मे शिक्षक व्यर्थ ही मेहनत करते हैं। स्कूल मे एक टी वी ही रख देना चाहिए। महाभारत, महाराणा प्रताप, अशोक, चाणक्य, चन्द्रगुप्त और अकबर आदि पर आधारित विषयों का ज्ञानार्जन छात्र स्वयं ही कर लेंगे। बच्चे तो अब सब कुछ टी वी से ही ‘सीख’ रहे हैं न। एक दिन मैंने अपने मित्र के सुपुत्र से राह   चलते अकबर के बारे मे पूछ लिया, तो उसका उत्तर सुन मेरा इतिहास का ज्ञान पानी भरने लगा। उसने कहा कि अकबर शहँशाह ए हिन्द था। वह ऐसा बादशाह था, जो जोधा के आगे पीछे घूमता रहता था। आवाज़ मे खराश के बावजूद भी उसकी ‘डायलॉग डिलिवरी’ कमाल की हुआ करती थी। वो पंद्रह बीस सैनिकों की सेना साथ ही युद्ध करने निकल पड़ता था। मैंने उससे आग्रह किया कि ज़रा भारत के वीर पुत्र महाराणा प्रताप के बारे मे भी अपना ‘टीवीनुमा’ ज्ञान साझा करे। वह खुश होते हुए बोला- प्रताप सच मे भारत का वीर पुत्र था। हमारे जैसी पंद्रह वर्ष की बाली उमरिया मे ही वो ‘फूल’ और ‘अजब’ के मध्य गज़ब का संतुलन बनाना सीख गया था और वीरता से उसका निर्वाह कर रहा था।    
उधर दूसरी ओर, हर धारावाहिक मे करोड़पति परिवार मे सास या बहू किसी आतंकवादी सरगना से कमतर नहीं लगती। बैठे बिठाये ये सास और बहुएँ एक दूसरे को मात देने हेतु नूतन पैंतरे सीखती है। टी वी के साथ साथ हमारे आपके घरों मे भी खटराग रोज़ाना अलापा जाता है। आजकल के धारावाहिक तो जैसे समाप्त होने का नाम ही नहीं लेते। वे महंगाई, भ्रष्टाचार और अत्याचार की भांति बढ़ते ही जा रहे हैं। लगभग सभी धारावाहिकों मे कहानी और लंबाई मे गज़ब की ‘एकता’ दिखती है। कमाल की बात ये है कि ये धारावाहिक बनाने वाले अर्थशास्त्र के बड़े ज्ञाता होते हैं। मांग और आपूर्ति के बीच लोचदार संतुलन बनाए रखते हैं। ये जानते हैं कि जनता सदैव एक ‘उदासीन वक्र’ ही रहेगी। कई बार तो ऐसा होता है कि जिसे हम बेटा/बेटी समझते हैं, वह पिता/माँ निकलते हैं। यदि नायक और नायिकाएँ दो तीन बार मरने के पश्चात पुनर्जन्म न लें, तो समझो नाटक मे दम नहीं रहा। नए ‘ट्रेन्डानुसार’ कई धारावाहिकों को सरकारी पंचवर्षीय योजनाओं की भांति आगे खिसखाने का कार्यक्रम अनवरत जारी है। हर माह एक नया चैनल और सीरियल उत्पन्न हो जाता है। कभी कभी तो लगता है, मानों इन ‘सीरियल्स’ ने भारत की बढ़ती आबादी के आंकड़े को ठेंगा दिखाने की ठानी हो।
आलम यह है कि अब तो आदमी अपने कार्यालय से घर पहुंचता है, तो उसे ठंडे खाने से ही संतोष करना पड़ता है। घर की सारी महिलाएं अपने पसंदीदा कार्यक्रम देखने के लिए भोजन की व्यवस्था घंटों पहले ही कर देती हैं। पुरुषों को इसी बात से संतोष करना पड़ता है कि इस टी वी के कारण दिन के कुछ घंटे उन्हे शांतिपूर्वक व्यतीत करने को मिल जाते हैं।
मेरे पड़ोसी शर्मा जी छुट्टियों मे परिवार समेत किसी फूहड़ ‘रियालिटी शो’ मे जाने का प्लान बना रहे हैं। वे यह जान कर खुश हो रहे हैं कि दर्शक बनने के भी पैसे मिलते हैं। छुट्टियों का अच्छा उपयोग हो जाएगा। कुछ घंटे दर्शक बनेंगे और कुछ घंटे मौज मस्ती करेंगे। मैंने उन्हें बता दिया है कि पूरा प्रबंध कर के जाएँ। मसलन भोजन की व्यवस्था सुदृढ़ कर लें और पानी जैसे तरल पदार्थ कम लें। पता नहीं स्टुडियो के बाहर कब निकलने दिया जाए।

-    अभिषेक अवस्थी


बिजली कटौती की ‘थर्ड डिग्री’ यातना ...

बिजली कटौती की ‘थर्ड डिग्री’ यातना ...
आजकल उत्तर प्रदेश की जनता बेहद खौफ़ज़दा है। हर पल डर के साए मे जीवनयापन करने वाली जनता अमित शाह के चुनावी खेल मे भाग लेकर खासा परेशान है। वह पछता रही है। जनता जिस खेल मे स्वयं को ‘मैन ऑफ दि मैच’ समझने के प्रवंचन मे थी, उसमे वह बस पानी पिलाने वाले खिलाड़ी की तरह ही थी। अच्छे दिन के जोश मे, उत्तर प्रदेश की जनता ने वोट को शक्ति समझने  का जो कांड कर डाला, उसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है। चुनाव के दो माह चार दिन की चाँदनी के समान थे और अब हमारे जीवन मे अंधेरी रातें मात्र ही बची हैं।
खैर, मैं बात कर रहा था जनता (हमारे) के खौफ़ज़दा होने की। चौंकिए मत जनाब! यू पी वाले बलात्कार, चोरी, डकैती, हत्या, घूसख़ोरी, फिरौती आदि से अब कदापि भयभीत नहीं होते हैं। नेता जी के आशीर्वाद से लोगो को अब इनकी आदत सी है। उत्तर प्रदेश का आई एस आई एस तो ‘बिजली कटौती’ है, जिससे जनता बड़ी आतंकित रहती है। प्रदेश के हुक्मरानों को पता है कि आमजन को ‘सबक’ सीखाने हेतु बिजली कटौती से अच्छी ‘थर्ड डिग्री’ प्रताड़ना नहीं हो सकती है। आलम यह है कि हम रात भर बिजली के स्वागत मे बाहें बिछाए रहते हैं, किन्तु ये बिजली एक्सप्रेस है कि इटावा स्टेशन से हिलने का नाम ही नहीं लेती है। जनता बिजली के गमनागमन से वैसे ही आतंकित महसूस कर रही है जैसे हमास के लोग बम वर्षा से भयभीत हैं।
मेरे परम मित्र ने मुझे बताया कि उन्होने सरकार को एक हलफ़नामा और माफ़ीनाम भेजा है। जिसमे उन्होने  लिखा है कि वे अपनी भूल स्वीकार करते हैं। आगामी चुनावों मे वे इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे कि ‘अपने प्रदेश’ मे सरकार किसकी है और उसका कार्यकाल कितना बचा हुआ है। अब वोट को अपनी ताकत नहीं, वरन मजबूरी समझ उसका क्रियान्वयन करेंगे।
मित्र को इतना आतंकित देखकर मैं भी आतंकित हो गया हूँ। अपने घर के सारे विद्युत उपकरण की तस्वीरें ओएलएक्स पे अपलोड कर दी हैं। किन्तु वहाँ यह समस्या है कि उत्तर प्रदेश के अधिकांश लोग उपकरण खरीदना नहीं बल्कि खुद बेचना चाहते हैं। दूसरे प्रदेशों के लोग यह कह कर मुंह मोड़रहे हैं कि जो उपकरण लंबे समय तक बंद पड़े हों, वे अमूमन काम करना बंद कर देते हैं।
                -       अभिषेक अवस्थी