Thursday, 4 June 2015

नई दुनिया - अधबीच 04-06-15
ये आरक्षण का जिन्न जब तब बोतल से बाहर निकल आता है। सरकार अलादीन की भांति इसे तमाम जद्दोजहद करके हर बार बोतल मे बंद करती है। परंतु ये है कि गुलामी पसंद नहीं करता है। अपने चाहने वालों की सहायता से यह हर बार बोतल का ढक्कन खोल, कुछ तूफानी करने को आतुर हो जाता है। इस जिन्न का ‘इस्तेमाल’ करने वाले सहायक नाम के प्राणी भी कम नही हैं। जब-जब इनको लगता है कि मेहनत, शिक्षा और पराए सुख से इन्हें कष्ट है, तब-तब ये आरक्षण के जिन्न को ‘पेरोल’ पे आज़ाद करवाते हैं। तदुपरान्त रेलवे की पटरियों पे ये दोनों मिलकर अपना तांडव करते हैं। जिन्न को दूल्हे का रूप देकर अपने मतलब की घोड़ी को रेलवे ट्रैक पर दौड़ाते हुए, सरकारी दुल्हन तक पहुंचाया जाता है। प्रदर्शनकारी बारातियों को ये पूरा भरोसा रहता है कि भारत भर के रेलवे ट्रैक पर उनका मालिकाना हक़ है।
पिछले दिनों मैं भी एक ऐसे ही प्रसंग मे फंसा था। दरअसल हुआ यूँ कि जिस ट्रेन से मैं सफर कर रहा था, वह अचानक किसी वीरान जगह पे रुक गयी। रुकना कोई नई बात नहीं है। लेकिन किसी प्राइवेट अस्पताल की तरह साफ-सुथरे मौसम मे, एक सुपर फास्ट एक्सप्रेस ट्रेन का चार घंटे से ऊपर यथास्थान खड़े रहना अवश्य ही नयी बात है। अरे! एक रेलगाड़ी ही है न! कोई देश की गरीबी तो है नहीं कि जो अड़ियल बनकर एक ही स्थान पे टिकी रहे। न नीचे खिसकती है न ऊपर। मुई वहीं की वहीं धरी है। ख़ैर, जैसा की सदैव होता है, ट्रेन रुकते ही मेरी बोगी के अधिकांश ‘मर्द’ अपने माथे पे प्रश्नसूचक उभारते हुए नीचे उतार गए। ट्रेन रुकने पर मर्द अक्सर द्रुतगामी हो जाते हैं। वे आविलम्ब इंजन की ओर ऐसे लपकते हैं जैसे रेलवे का सम्पूर्ण अतलस्पर्शी ज्ञान उन्हें ही प्राप्त हो। कुछ महानुभाव तो इतना कॉन्फिडेंटली अपने क़दम इंजन की ओर बढ़ाते हैं, जैसे हर समस्या का निदान उनके पास ही उपलब्ध हो। गोया कि लोकोपायलट का पूरा कोर्स उन्होने आत्मसात किया है। यदि ड्राईवर बीमार हो गया तो वे ही गाड़ी ले उड़ेंगे। मैने भी अपना आलस्य त्यागा। मांजरा समझने हेतु खरामा-खरामा इंजन की ओर बढ़ा। पता चला कि कुछ प्रदर्शनकारी ट्रेन के आगे कटने को तैयार ‘पड़े’ थे। पास मे ही एक नौजवान प्रदर्शनकारी कोलड्रिंक पीता दिखा। समय बिताने के लिए मैंने उसे पकड़ा। सवाल जवाब शुरू हुए।
मैंने पूछा, ‘तुम तो अच्छे खासे नौजवान हो। मेहनत करो, पढ़ाई करो। उसके दम पे नौकरी पाओ। ये आडंबर क्यों?’
‘तो अभी भी तो मेहनत ही तो कर रहें हैं न बाबूजी...!’ युवक ने उत्तर मे कहा, ‘इत्ती धूप मे चेहरा लाल हुआ जा रहा है...जब औरों को आरक्षण मिल रहा है, तो हमारी बिरादरी को भी मिलना चाहिए न!’
‘इससे तुम्हें क्या फायदा क्या होगा?’
‘अजी! ज़ाहिर सी बात है...इत्ती रगड़म-रगड़ाई न करनी पड़ेगी। नंबर कम भी आएंगे तो आरक्षण को ढाल बनाकर नौकरी के चक्रव्युह को तोड़ देंगे...’
‘फिर तुम्हें आरक्षण मिलने के बाद, दूसरी बीरादरी वाले हल्ला मचाने लगेंगे,’ मैंने कहा।
वह बोला, ‘जी! मचाने दो हल्ला। वो भी मांगे आरक्षण...देखी जाए तो हम तो उनका भला ही करने निकले हैं जी...तुलसीदास कह गए हैं, “पर हित सरिस धर्म नहिं भाई” अर्थात...
‘इस पंक्ति का अर्थ मैं जानता हूँ’ मैंने उसे बीच मे रोकते हुए कहा, ‘तुमलोग स्वार्थी हो रहे हो... तुलसीदास जी तो यह भी कह गए हैं कि “पर पीड़ा सम नहिं अधमाई”। तुम्हारे कारण लाखों रेल यात्री व्यथित हैं। रेलवे का घाटा बढ़ रहा है...करोड़ों का नुकसान...’
‘ओ बाबूजी...’ इस बार बीच मे रोकने की बारी नौजवान की थी, सो वह बीच मे बोला, ‘ज़्यादा ज्ञान न बघारो... इत्ता ही ज़्यादा है तो सरकार मे बाँट दो... हम तो प्रदर्शन करते रहेंगे...दम हो तो ट्रेन हमारे ऊपर से ही चलवा दो...वरना बस पकड़ लो...ट्रेन तो हम न चलने देंगे जी...’
उसकी बातों का जवाब यही था कि मैं चुपचाप बस ही पकड़ लूँ। सोच रहा हूँ, तमाम रेलयात्रियों की ओर से रेल मंत्रालय को एक ‘रायनुमा’ पत्र लिखूँ। पत्र द्वारा मैं रेल मंत्रालय से विनम्र निवेदन करूंगा कि हर राज्य के हर शहर मे अलग से रेलवे ट्रैक का निर्माण हो। वहाँ कृत्रिम ट्रेनें चलें। एक अधिसूचना ज़ारी की जाए कि ये रेल ट्रैक सिर्फ और सिर्फ, प्रदर्शनकारियों के लिए विशेष रूप से निर्मित किया गया है। अतः, सभी छात्रनेताओं, किसाननेताओं, धर्मनेताओं, और प्रदर्शनप्रेमियों, को यह अधिकार है कि वे धरना और विरोध प्रदर्शन, जीत और हार प्रदर्शन, यहाँ तक कि जो अप्रदर्शनीय है, उसका भी प्रदर्शन करें। बाकी, चुनावकाल मे सरकार सबकी सुनती भी है, और वादों को ड्राफ्ट भी करती है।

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