हैप्पी बड्डे सरकार...
सुना है सरकार का बड्डे है, वो भी हैप्पी वाला! कमाल है जी, राष्ट्रीय छुट्टी भी नही घोषित हुई। अच्छे दिन, बुलेट ट्रेन काला धन आदि नही आए, न सही। किंतु भई, पहले जन्मदिन के उपलक्ष्य मे आम टाइप वाले भाइयों, बहनों और मित्रों को एक अदद केक का टुकड़ा ही डाल देते। ख़ैर, जहां देखा चारा वहां मुँह मारा की तर्ज़ पर एक नामी न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर, सरकार को जन्मदिन की बधाई देने के बहाने उनका साक्षात्कार कर लाए। उसी का कुछ भाग पेश-ए-खिदमत है-
रिपोर्टर- सरकारश्री, आपको जन्मदिन की बधाई।
सरकर- ठीक है, अपने 'केक का टुकड़ा' लो और अपनी पर आ जाओ।
रिपोर्टर- आप एक वर्ष के हो गए। कैसा लग रहा है।
सरकर- सबकुछ नया नया सा लग रहा है। अभी तो पूरी दुनिया देखनी बाकी है। रिपोर्टर- तो आगे की क्या योजना है? सरकार - कहा न! दुनिया देखनी है, जश्न मनाना है, सरकार रूपी जन्म बार बार थोड़ी न मिलता है भाई।
रिपोर्टर- और कितने दिन जश्न मनाएंगे? सरकार- जब तक बालिग नही हो जाते।
रिपोर्टर - अच्छा, ये मेक इन इंडिया का बड़ा शोर है। लेकिन जमीनी स्तर पे कुछ होता तो दिख नही रहा।
सरकार- क्यों नही होता दिख रहा है? आदमी साल भर से बन रहा है, और हम बना रहे हैं। तो हुआ न मेक इन इंडिया?
रिपोर्टर- तो ऐसे विकास कैसे होगा? सरकार- देखो, हर आदमी का विकास स्वयं उसका ही दायित्व है। इसमे हम क्या करें? हम तो 'अपने' विकास के दायित्व को तत्परता से पूर्ण करने हेतु शपथबद्ध हैं। रिपोर्टर- ओह! इस विषय मे थोड़ा विस्तार से बताइए।
सरकार- तुम रिपोर्टर लोग हमेशा बाल की खाल निकालने मे लगे रहते हो। देखो, हमने न्यायपालिका को लगभग अपने कब्जे मे कर लिया है। तुम लोगो को तो पता ही होगा, कैसे दनादन फैसले पे फैसले आ रहे हैं आजकल। एक दोहा टाइप सुनो, " पावर और पैसे का, ऐसा देखा मेल... तेरह साल मे जेल हुई,घंटे भर मे बेल..." हम तो इसी दोहे पे भरोसा रखते हैं। वो जुमला तो सुना होगा न "सबका साथ, सबका विकास"। बस थोड़ा फ़ेरबदल हुआ है उसमे। अब हो गया है, "सबका साथ,अपना विकास" रिपोर्टर- आपका जन्म हुए एक वर्ष बीत गया है। क्या कुछ ख़ास हुआ आपके साथ या आपने क्या ख़ास किया? सरकार- बहुत कुछ ख़ास किया हमने। योजनाओं पे योजनाएँ लॉन्च करी। जैसे जनधन योजना। जनता का धन, पहले बैंकों मे जाएगा, फ़िर व्यापारियों के पास, तत्पश्चात जोड़जाड़ के हमारे पास आयेगा। हमने ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं करी। स्वच्छता अभियान लॉन्च किया। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ मिशन लॉन्च किया। और तो और मंगल यान भी हमने ही लॉन्च किया।
रिपोर्टर- लेकिन स्वच्छता तो चुनावी जुमला टाइप हो गयी है। जमीनी स्तर पे दिखती ही नही है। और बेटियां पढ़ने-बचने की बजाय मर-कट रहीं हैं।
सरकार- देखो, दोनों ही मामलों मे हम यही कहेंगे कि आदमी का विकास उसका ख़ुद का काम है।
रिपोर्टर- अच्छा, आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? सरकार- जी, 'घोषणा' को 'चुनावी जुमला' सिद्ध करना। जनता मे अब भी यह विश्वास बनाए रखना कि अच्छे दिन आएँगे।
रिपोर्टर- हमारे न्यूज़ चैनल के माध्यम से आप अपने जन्मदिन पर जनता को कुछ संदेश देना चाहेंगे। सरकार- जी ज़रूर। मित्रों... अच्छे दिन आएँगे। अवश्य आएँगे, बस हमें बालिग होने दीजिए। अच्छे दिन बुलेट ट्रेन की गति से आएँगे। हाँ, आप ध्यान रखें कि काला चश्मा धारण न करें। वरना बुलेट ट्रेन की गति से आ रहे अच्छे दिन आपको दिखेंगे नही। फ़िर आप हम पे दोषारोपण करेंगे कि अच्छे दिन सरपट निकल गए और बुलेट ट्रेन आप को ही रौंद कर, विदेश भ्रमण पे निकल गयी। धन्यवाद!
सुना है सरकार का बड्डे है, वो भी हैप्पी वाला! कमाल है जी, राष्ट्रीय छुट्टी भी नही घोषित हुई। अच्छे दिन, बुलेट ट्रेन काला धन आदि नही आए, न सही। किंतु भई, पहले जन्मदिन के उपलक्ष्य मे आम टाइप वाले भाइयों, बहनों और मित्रों को एक अदद केक का टुकड़ा ही डाल देते। ख़ैर, जहां देखा चारा वहां मुँह मारा की तर्ज़ पर एक नामी न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर, सरकार को जन्मदिन की बधाई देने के बहाने उनका साक्षात्कार कर लाए। उसी का कुछ भाग पेश-ए-खिदमत है-
रिपोर्टर- सरकारश्री, आपको जन्मदिन की बधाई।
सरकर- ठीक है, अपने 'केक का टुकड़ा' लो और अपनी पर आ जाओ।
रिपोर्टर- आप एक वर्ष के हो गए। कैसा लग रहा है।
सरकर- सबकुछ नया नया सा लग रहा है। अभी तो पूरी दुनिया देखनी बाकी है। रिपोर्टर- तो आगे की क्या योजना है? सरकार - कहा न! दुनिया देखनी है, जश्न मनाना है, सरकार रूपी जन्म बार बार थोड़ी न मिलता है भाई।
रिपोर्टर- और कितने दिन जश्न मनाएंगे? सरकार- जब तक बालिग नही हो जाते।
रिपोर्टर - अच्छा, ये मेक इन इंडिया का बड़ा शोर है। लेकिन जमीनी स्तर पे कुछ होता तो दिख नही रहा।
सरकार- क्यों नही होता दिख रहा है? आदमी साल भर से बन रहा है, और हम बना रहे हैं। तो हुआ न मेक इन इंडिया?
रिपोर्टर- तो ऐसे विकास कैसे होगा? सरकार- देखो, हर आदमी का विकास स्वयं उसका ही दायित्व है। इसमे हम क्या करें? हम तो 'अपने' विकास के दायित्व को तत्परता से पूर्ण करने हेतु शपथबद्ध हैं। रिपोर्टर- ओह! इस विषय मे थोड़ा विस्तार से बताइए।
सरकार- तुम रिपोर्टर लोग हमेशा बाल की खाल निकालने मे लगे रहते हो। देखो, हमने न्यायपालिका को लगभग अपने कब्जे मे कर लिया है। तुम लोगो को तो पता ही होगा, कैसे दनादन फैसले पे फैसले आ रहे हैं आजकल। एक दोहा टाइप सुनो, " पावर और पैसे का, ऐसा देखा मेल... तेरह साल मे जेल हुई,घंटे भर मे बेल..." हम तो इसी दोहे पे भरोसा रखते हैं। वो जुमला तो सुना होगा न "सबका साथ, सबका विकास"। बस थोड़ा फ़ेरबदल हुआ है उसमे। अब हो गया है, "सबका साथ,अपना विकास" रिपोर्टर- आपका जन्म हुए एक वर्ष बीत गया है। क्या कुछ ख़ास हुआ आपके साथ या आपने क्या ख़ास किया? सरकार- बहुत कुछ ख़ास किया हमने। योजनाओं पे योजनाएँ लॉन्च करी। जैसे जनधन योजना। जनता का धन, पहले बैंकों मे जाएगा, फ़िर व्यापारियों के पास, तत्पश्चात जोड़जाड़ के हमारे पास आयेगा। हमने ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं करी। स्वच्छता अभियान लॉन्च किया। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ मिशन लॉन्च किया। और तो और मंगल यान भी हमने ही लॉन्च किया।
रिपोर्टर- लेकिन स्वच्छता तो चुनावी जुमला टाइप हो गयी है। जमीनी स्तर पे दिखती ही नही है। और बेटियां पढ़ने-बचने की बजाय मर-कट रहीं हैं।
सरकार- देखो, दोनों ही मामलों मे हम यही कहेंगे कि आदमी का विकास उसका ख़ुद का काम है।
रिपोर्टर- अच्छा, आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? सरकार- जी, 'घोषणा' को 'चुनावी जुमला' सिद्ध करना। जनता मे अब भी यह विश्वास बनाए रखना कि अच्छे दिन आएँगे।
रिपोर्टर- हमारे न्यूज़ चैनल के माध्यम से आप अपने जन्मदिन पर जनता को कुछ संदेश देना चाहेंगे। सरकार- जी ज़रूर। मित्रों... अच्छे दिन आएँगे। अवश्य आएँगे, बस हमें बालिग होने दीजिए। अच्छे दिन बुलेट ट्रेन की गति से आएँगे। हाँ, आप ध्यान रखें कि काला चश्मा धारण न करें। वरना बुलेट ट्रेन की गति से आ रहे अच्छे दिन आपको दिखेंगे नही। फ़िर आप हम पे दोषारोपण करेंगे कि अच्छे दिन सरपट निकल गए और बुलेट ट्रेन आप को ही रौंद कर, विदेश भ्रमण पे निकल गयी। धन्यवाद!
-अभिषेक अवस्थी
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