किस्सा लोकपाल और लोकतंत्र का...
एक बार की बात है। आंदोलन नामक व्यक्ति के दो सुपुत्र थे। एक का नाम था लोकतंत्र और दूसरे का लोकपाल। कहने को लोकतंत्र बड़ा था किंतु अपने क्रियाकलापों के कारण लोकपाल ही बड़ा माना जाता था। वह लोकतंत्र और उसके मित्रों पे निरंतर नज़र रखता था। वह चाहता था कि उसका भाई चाह कर भी कुछ ग़लत न करे। कोई भी गलती होती तो फौरन पिताजी से शिकायत हो जाती। नामानुसार पिताजी आंदोलन कर डालते और सुपुत्र को कुपुत्र होने से बचा लेते। तीनों मे बड़ा सौहार्दपूर्ण सामंजस्य था। उनकी एकता, ईमानदारी एवं कमज़ोर के पक्ष मे लड़ने की शांतिपूर्ण कला के लिए वे दूर-दूर तक प्रख्यात हो गए थे। चहुंओर उनकी ही चर्चा थी। सब मन ही मन उन्हे अपना नेता और आदर्श मान बैठे थे।
एक बार की बात है। आंदोलन नामक व्यक्ति के दो सुपुत्र थे। एक का नाम था लोकतंत्र और दूसरे का लोकपाल। कहने को लोकतंत्र बड़ा था किंतु अपने क्रियाकलापों के कारण लोकपाल ही बड़ा माना जाता था। वह लोकतंत्र और उसके मित्रों पे निरंतर नज़र रखता था। वह चाहता था कि उसका भाई चाह कर भी कुछ ग़लत न करे। कोई भी गलती होती तो फौरन पिताजी से शिकायत हो जाती। नामानुसार पिताजी आंदोलन कर डालते और सुपुत्र को कुपुत्र होने से बचा लेते। तीनों मे बड़ा सौहार्दपूर्ण सामंजस्य था। उनकी एकता, ईमानदारी एवं कमज़ोर के पक्ष मे लड़ने की शांतिपूर्ण कला के लिए वे दूर-दूर तक प्रख्यात हो गए थे। चहुंओर उनकी ही चर्चा थी। सब मन ही मन उन्हे अपना नेता और आदर्श मान बैठे थे।
उनकी अनवरत बढ़ती ख्याति से तमाम
स्थानों की सरकारें और उनके नुमाइंदो की नाक-भौं सिकुड़ने लगी। उन्हे डर सताने लगा
कि अगर ये लोग सत्ता के गलियारे मे चहलकदमी भी करने लगे तो उनकी दाल गलनी बंद हो
जाएगी। मंत्रियों-सन्त्रियों ने मंत्रणा की। निष्कर्ष यह निकला कि तीनों को
भ्रष्टाचारी, घोटालेबाजी जैसी मादक वस्तुएँ प्रदान
की जाएँ। एक बार इनका नशा चढ़ गया तो छुड़ाए नही छूटता।
परंतु बाप-बेटे बड़े ज्ञानी एवं
भविष्यद्रष्टा थे। उनके विशिष्ट सूत्रों से उन्हें सरकारों की यह चाल पता चल गयी।
बस, बात ऐसे बिगड़ी कि बिगड़ती चली गयी। पिता ने सरकारों
और उनकी नीतियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया और अपने नाम को शांतिपूर्वक सार्थकता
प्रदान करने लगे। लोकपाल और लोकतंत्र ने अपने वकील, पत्रकार
मित्रों के साथ एक बड़ा जनसमर्थन तैयार किया। अमूमन आम लोग सरकार से असंतुष्ट ही
होते हैं। इनमें कुछ तो सरकार बनाने मे सहयोग देने वाले भी होते हैं। सब आंदोलन
बाबू, लोकतंत्र और लोकपाल से जुड़ते चले गए।
आंदोलन बाबू ने सरकार विरोधी धरने दिए। खराब नीतियों को हटाकर नयी नीतियां और सरकारी तंत्र मे पारदर्शिता लाने हेतु कई दिनों तक भूख हड़ताल भी की। उनके मुताबिक़ दुनिया या कि उनके देश का सबसे सच्चा, ईमानदार, साफ़दिल व्यक्ति सरकार की निगरानी करे। सरकार को घोटाले जैसे कृत्य करने से रोके। जो व्यक्ति इस क्रिया को सिद्ध कर सकता था, वह था आंदोलन बाबू का पुत्र लोकपाल। सो सभी लोकपाल की पैरवी करने लगे। नारेबाज़ी, पोस्टरबाज़ी, और सोशलमीडियाबाज़ी से चहुंओर इसका शोर होने लगा लोकपाल को सरकार के ऊपर बिठाना होगा। गोया इस देश की तरक्की तभी सम्भव होगी जब लोकपाल जैसा व्यक्ति प्रधानमंत्री से भी ऊपर के पद पर होगा। जैसे कि लगभग हर आदमी मे व्याप्त भ्रष्टाचार, दुष्कर्म, चोरी, डकैती, घरेलू हिंसा लोकपाल के आने पर रुक जाएगी। जैसे कि लोकपाल के आने पर लोग सड़कों पर थूकना बंद कर देंगे और यातायात के नियमों का कड़ाई से पालन करेंगे।
ख़ैर, इतना सब होने बावज़ूद सरकारों ने बात नही मानी। आंदोलन बाबू ने थक हारकर घर वापसी का मन बनाया और और अपनी भूख प्यास मिटाई। उनके साथ लोकपाल भी चलना चाहता था। अचानक लोकतंत्र का माथा ठनका। कभी न बोलने वाला लोकतंत्र उस दिन बोलने लगा उसने औने भाई और पिता को समझाया - "देखो, अभी बहुत से सताये हुए लोग हमारे साथ हैं।यही मौका है कि हम कुछ बड़ा करें"
आंदोलन बाबू ने पुत्र की मंशा जानते हुए भी उसे साफ-साफ समझाने को कहा। लोकतंत्र बोला "मैं चाहता हूँ कि हम एक पार्टी बनाए और चुनाव लड़ें।यदि जीत गए तो लोकपाल भाई को मैं उचित स्थान दिलाऊँगा। अपने देश को बदल दूँगा।"
आंदोलन बाबू ने इसके लिए साफ इनकार कर दिया और घर वापसी कर गए। लोकपाल वही रुक गया ताकि अपने भाई की गतिविधियों मे वह भरपूर सहयोग कर सके।
आंदोलन बाबू ने सरकार विरोधी धरने दिए। खराब नीतियों को हटाकर नयी नीतियां और सरकारी तंत्र मे पारदर्शिता लाने हेतु कई दिनों तक भूख हड़ताल भी की। उनके मुताबिक़ दुनिया या कि उनके देश का सबसे सच्चा, ईमानदार, साफ़दिल व्यक्ति सरकार की निगरानी करे। सरकार को घोटाले जैसे कृत्य करने से रोके। जो व्यक्ति इस क्रिया को सिद्ध कर सकता था, वह था आंदोलन बाबू का पुत्र लोकपाल। सो सभी लोकपाल की पैरवी करने लगे। नारेबाज़ी, पोस्टरबाज़ी, और सोशलमीडियाबाज़ी से चहुंओर इसका शोर होने लगा लोकपाल को सरकार के ऊपर बिठाना होगा। गोया इस देश की तरक्की तभी सम्भव होगी जब लोकपाल जैसा व्यक्ति प्रधानमंत्री से भी ऊपर के पद पर होगा। जैसे कि लगभग हर आदमी मे व्याप्त भ्रष्टाचार, दुष्कर्म, चोरी, डकैती, घरेलू हिंसा लोकपाल के आने पर रुक जाएगी। जैसे कि लोकपाल के आने पर लोग सड़कों पर थूकना बंद कर देंगे और यातायात के नियमों का कड़ाई से पालन करेंगे।
ख़ैर, इतना सब होने बावज़ूद सरकारों ने बात नही मानी। आंदोलन बाबू ने थक हारकर घर वापसी का मन बनाया और और अपनी भूख प्यास मिटाई। उनके साथ लोकपाल भी चलना चाहता था। अचानक लोकतंत्र का माथा ठनका। कभी न बोलने वाला लोकतंत्र उस दिन बोलने लगा उसने औने भाई और पिता को समझाया - "देखो, अभी बहुत से सताये हुए लोग हमारे साथ हैं।यही मौका है कि हम कुछ बड़ा करें"
आंदोलन बाबू ने पुत्र की मंशा जानते हुए भी उसे साफ-साफ समझाने को कहा। लोकतंत्र बोला "मैं चाहता हूँ कि हम एक पार्टी बनाए और चुनाव लड़ें।यदि जीत गए तो लोकपाल भाई को मैं उचित स्थान दिलाऊँगा। अपने देश को बदल दूँगा।"
आंदोलन बाबू ने इसके लिए साफ इनकार कर दिया और घर वापसी कर गए। लोकपाल वही रुक गया ताकि अपने भाई की गतिविधियों मे वह भरपूर सहयोग कर सके।
चुनाव हुए। लोकतंत्र भारी बहुमत से
जीत गया। चारों ओर खुशी की लहर दौड़ गयी। लोकपाल भी ख़ुश था कि
अंततः उसे उचित स्थान दिया जाएगा। लोकतंत्र ने अपने मित्रों से कहा कि हमें दूसरे
दलों की भांति भ्रष्टाचारी, अत्याचारी और अहंकारी
नही बनना है। हमे तो सेवा करनी है।
लोकतंत्र ने शपथ ली। लोकपाल को अपने ऊपर बिठाया और उसे स्वतंत्रा से अपना काम करने को कहा।
कुछ ही दिन बीते होंगे कि लोकतंत्र की सरकार पर लोकपाल ने उँगली उठायी। जाँच बिठाई। लोकतंत्र को यह बात पसंद नही आयी। पसंद आनी भी नही थी। दरसल लोकतंत्र अब सत्ता और लोभ की क़ैद मे था। लोकतंत्र अब परतंत्र हुआ जा रहा था। अहंकारी परतंत्रतावादी लोकतंत्र को यह बात नागवार गुज़री कि कोई उसपर उँगली उठाए। परिणामस्वरूप उसने लोकपाल को बर्खास्त कर दिया।
लोकपाल अपने ही भाई के इस कृत्य से अत्यधिक दुखी हुआ। वह अवसादग्रस्त हो गया। फ़िर उसका कहीँ कुछ पता नही चला। कूछ महीनों बाद अखबारों मे सुर्ख़ियां बनी एक ख़बर आयी- "लोकतंत्र के भाई लोकपाल की संदिग्ध हालात मे मौत। प्रथमदृष्ट्या मामला आत्महत्या का लगता है। लोकतंत्र सदैव की तरह चुप्पी साध गए।"
- अभिषेक अवस्थी
लोकतंत्र ने शपथ ली। लोकपाल को अपने ऊपर बिठाया और उसे स्वतंत्रा से अपना काम करने को कहा।
कुछ ही दिन बीते होंगे कि लोकतंत्र की सरकार पर लोकपाल ने उँगली उठायी। जाँच बिठाई। लोकतंत्र को यह बात पसंद नही आयी। पसंद आनी भी नही थी। दरसल लोकतंत्र अब सत्ता और लोभ की क़ैद मे था। लोकतंत्र अब परतंत्र हुआ जा रहा था। अहंकारी परतंत्रतावादी लोकतंत्र को यह बात नागवार गुज़री कि कोई उसपर उँगली उठाए। परिणामस्वरूप उसने लोकपाल को बर्खास्त कर दिया।
लोकपाल अपने ही भाई के इस कृत्य से अत्यधिक दुखी हुआ। वह अवसादग्रस्त हो गया। फ़िर उसका कहीँ कुछ पता नही चला। कूछ महीनों बाद अखबारों मे सुर्ख़ियां बनी एक ख़बर आयी- "लोकतंत्र के भाई लोकपाल की संदिग्ध हालात मे मौत। प्रथमदृष्ट्या मामला आत्महत्या का लगता है। लोकतंत्र सदैव की तरह चुप्पी साध गए।"
- अभिषेक अवस्थी
No comments:
Post a Comment