Sunday, 19 April 2015

राजकुमार की घरवापसी...

राजकुमार की घरवापसी...
भले वे हार गए हों। भले ही उनकी गद्दी और साम्राज्य छिन गया हो। परंतु सत्य यही है कि तमाम लोगों के लिए वे अब भी एक राजकुमार ही हैं। वे स्वयं भी अपने कारनामों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से यही कहते रहे हैं। मीडिया से लेकर समर्थक और विरोधी, सब उनकी घरवापसी का जश्न अपने तरीके से मना रहे हैं। हो भी क्यों न। आखिर एक राजकुमार सत्ता से विमुख होकर तपस्योन्मुख हुआ। वह घोर तपस्या करने हाँगकाँग जैसे किसी चमकीले, तड़कीले एवं भड़कीले स्थान पर जो गया। यह कतई मज़ाक की बात नहीं कि तमाम शानोशौकत और मेनकाओं की उपस्थिति मे भी वह लगभग दो माह के लिए ऋषि के रूप मे तपस्या करते रहे। बाकी ये अंदर की बात है। हम जैसे आम लोगो को जब देश के अंदर की बात नहीं ज्ञात नहीं होती तो भला विदेश मे क्या गुल खिलते हैं, इसका पता न कभी चल पाया था, न चल पाएगा। वो तो भला हो न्यूज़ वालों का कि क्रिकेटर और उसकी गर्लफ्रेंड से फुर्सत मिलते ही उनके अदृश्य होने की तिथि, मिलने की तिथि और कारण समेत उसके बाद की स्थिति से हमे अवगत करवा दिया। महान लेखक शरद जोशीजी ने कहा है – नियम की बात है कि हर तपस्या कुछ दिन बाद मज़े ज़रूर देती है। यह तय है कि मज़े मिलेंगे। यह बात दीगर है कि अब पाँच वर्ष प्रतीक्षारत रहना होगा। किन्तु मज़े मिलेंगे। क्योंकि मज़े देने वाले हम आम-कुमार ही हैं। हमारे पास विकल्प कम होते हैं।
उनका लौटना एक चिंगारी सी है। बेरोज़गार हुए उनके समरर्थक रूपी कार्यकर्ता यकायक नौकरी बजाने निकल पड़े। गोया कि वे जीत सुनिश्चित करने का कोई फॉर्मूला लेकर लौटे हों। जो पटाखे विजयावस्था मे फोड़ने का सपना था, वह तो पूरा न हुआ। दिवाली मे हार के गम के चलते पटाखे फोड़ने का मन न हुआ। विश्वकप ने भी मौका न दिया। लेदेकर अब मौका आया है। इससे पहले कि पटाखे एक्सपायर हो जाएँ उन्हे प्रयोग मे लाना ही होगा। सो सभी पिल पड़े। एक ऐसे ही विस्फोटक समर्थक से मेरी भेंट हुई। मैंने जश्न का कारण पूछते हुए कहा – वे मात्र विदेश मे छुट्टियाँ व्यतीत कर के ही तो आए हैं। कौन सा इंद्रदेव को समझा कर आए है कि भारत के किसानों को बख्श दें? अथवा ऐसा क्या ले आए हैं कि चतुर्दिश उनके लौटने का ही चर्चा है? क्या वे अपने चिंतन और मंथन के थैले मे कालाधन वापस लाने की कोई सृदृढ़ योजना लाए हैं? वे बोले- तब हारे तो हारे। यह दो महीने की तपस्या उनकी नैतिक विजय है। उन्होने वहाँ जो चिंतन किया है, उसका मंथन अवश्य ही करेंगे। हम उसी का जश्न मना रहे हैं। इसमे आम लोगो का कोई स्थान नहीं है। अतः आप दूर रहें। मैं सदैव की भांति चुप रहा और खुश रहा। अपने घर की गली पकड़ कर मैंने घरवापसी तय करी।
घर लौटते हुए मैंने पाया कि कुछ विरोधी गुट के लोग भी नाच गाना कर रहे थे। वे भी पटाखे फोड़ रहे थे। अंतर यह थे कि समर्थकों के पटाखे बड़ी उदासीनता के साथ ऊपर जाकर बिना आवाज़ किए फूट रहे थे। विरोधियों के पटाखे दहाड़ते हुए फुट रहे थे। एक विरोधी से मैं पूछ बैठा, भाई! राजकुमार तो उनके लौटे हैं। आप किस बात का जश्न बना रहे हैं? वह बोला – जिनके कारण हमे गद्दी मिली है, जी वे लौट के घर आ गए हैं, तो खुशियाँ मनाना तो बनता है न! और वैसे भी अब वे आ गए हैं तो मीडिया वाले थोड़ा हंसी-ठिठोली भी कर लेंगे और कुछ दिन हमे चैन से रहने देंगे
मैंने सोचा कि बात तो बंदा सही कह रहा है। हंसी ठिठोली तो हो ही रही है। सारा फोकस किसानों की अत्महत्या, बर्बर व्यवस्था, लूट-मार, भ्रष्टाचार आदि से हटकर राजकुमार पे जो आ गया है।

                           -अभिषेक अवस्थी 

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