जब मैं गाँव आता हूँ ...// Abhishek
जब कभी लंबे अरसे के बाद
मैं गाँव आता हूँ,
ख़ुद-ब-ख़ुद ‘मैं’ से
‘हम’ हो जाता हूँ...
उतार कर शहरी लबादा
और उसमे छुपे ढेरों अस्क़ाम
दिखावे से कोसों दूर,
मैं ख़ुद मे ख़ुद को पा जाता हूँ...
ख़लिश सी तो है
कि अब यहाँ कोई रहता नहीं
इस बड़े घर मे
जो धीरे धीर मकान हो रहा है,
फिर हमारी उम्र की तरह ही
खंडहर हो जाएगा...
लेकिन बड़ी यादें हैं यहाँ ,
गर्मियों मे गिनती के पचास दिन यहीं बिताना
धूप मे खेल कर स्वयं को भुजंग बनाना
दादी के स्कूल मे अपने गर्द शहरीपन का
बेमतलब मे रौब जमाना...
और सबसे यादगार तो है
चाची के हाथों से बना ‘पूरा खाना’
बनता वही था
दाल-चावल-सब्ज़ी-रोटी रोज़ाना
मगर स्वाद हर बार एकदम नया...
फिर रात मे एक बड़ा गिलास दूध का
जिसमे चीनी के साथ होती थी
चाची के प्यार की ममताभरी मिठास...
सच! अच्छे दिन तो वे ही थे...
घर के मंदिर मे हर छोटा-बड़ा त्योहार
भाई-बहनों संग उमंग से मनाना...
शिवरात्रि मे ‘शंकरजी’ के लिए
कुएं से ढेर सारा पानी निकालना...
होली-दिवाली पे
चाचा के सानिध्य मे
रंग खेलना और पटाखे फोड़ना...
बहुत याद आता है सब
मंदिर मे जड़ी भगवानों की मूर्तियाँ
वैसी की वैसी ही हैं- पूर्णतः शांत
बस कुछ बदला है तो
बदले हैं गाँव के लोग
जो ‘हम’ से ‘मैं’ हो गए
मैं, मेरे अपने भी है उसमे
या कि जैसे
शिक्षित होने के साथ
हम भाई-बहन सच मे ‘कज़िन’ हो गए....
बैठा हूँ उसी मंदिर पे ,
लगता है जैसे वही बचपन जी रहा हूँ अभी...
यहीं रह जाने का मन करता है,
मगर दिलो-दिमाग ने
फिर धारण कर लिया चोला शहर का
और मेरा ‘शरीर’ चल पड़ा है फिर
शहर की ओर ... गाँव से दूर ...
@अभिषेक2015
मैं गाँव आता हूँ,
ख़ुद-ब-ख़ुद ‘मैं’ से
‘हम’ हो जाता हूँ...
उतार कर शहरी लबादा
और उसमे छुपे ढेरों अस्क़ाम
दिखावे से कोसों दूर,
मैं ख़ुद मे ख़ुद को पा जाता हूँ...
ख़लिश सी तो है
कि अब यहाँ कोई रहता नहीं
इस बड़े घर मे
जो धीरे धीर मकान हो रहा है,
फिर हमारी उम्र की तरह ही
खंडहर हो जाएगा...
लेकिन बड़ी यादें हैं यहाँ ,
गर्मियों मे गिनती के पचास दिन यहीं बिताना
धूप मे खेल कर स्वयं को भुजंग बनाना
दादी के स्कूल मे अपने गर्द शहरीपन का
बेमतलब मे रौब जमाना...
और सबसे यादगार तो है
चाची के हाथों से बना ‘पूरा खाना’
बनता वही था
दाल-चावल-सब्ज़ी-रोटी रोज़ाना
मगर स्वाद हर बार एकदम नया...
फिर रात मे एक बड़ा गिलास दूध का
जिसमे चीनी के साथ होती थी
चाची के प्यार की ममताभरी मिठास...
सच! अच्छे दिन तो वे ही थे...
घर के मंदिर मे हर छोटा-बड़ा त्योहार
भाई-बहनों संग उमंग से मनाना...
शिवरात्रि मे ‘शंकरजी’ के लिए
कुएं से ढेर सारा पानी निकालना...
होली-दिवाली पे
चाचा के सानिध्य मे
रंग खेलना और पटाखे फोड़ना...
बहुत याद आता है सब
मंदिर मे जड़ी भगवानों की मूर्तियाँ
वैसी की वैसी ही हैं- पूर्णतः शांत
बस कुछ बदला है तो
बदले हैं गाँव के लोग
जो ‘हम’ से ‘मैं’ हो गए
मैं, मेरे अपने भी है उसमे
या कि जैसे
शिक्षित होने के साथ
हम भाई-बहन सच मे ‘कज़िन’ हो गए....
बैठा हूँ उसी मंदिर पे ,
लगता है जैसे वही बचपन जी रहा हूँ अभी...
यहीं रह जाने का मन करता है,
मगर दिलो-दिमाग ने
फिर धारण कर लिया चोला शहर का
और मेरा ‘शरीर’ चल पड़ा है फिर
शहर की ओर ... गाँव से दूर ...
@अभिषेक2015
No comments:
Post a Comment