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Wednesday, 31 December 2014

जब मैं गाँव आता हूँ

जब मैं गाँव आता हूँ ...// Abhishek
जब कभी लंबे अरसे के बाद
मैं गाँव आता हूँ,
ख़ुद-ब-ख़ुद ‘मैं’ से 
‘हम’ हो जाता हूँ...
उतार कर शहरी लबादा
और उसमे छुपे ढेरों अस्क़ाम
दिखावे से कोसों दूर,
मैं ख़ुद मे ख़ुद को पा जाता हूँ...
ख़लिश सी तो है
कि अब यहाँ कोई रहता नहीं
इस बड़े घर मे
जो धीरे धीर मकान हो रहा है,
फिर हमारी उम्र की तरह ही
खंडहर हो जाएगा...
लेकिन बड़ी यादें हैं यहाँ ,
गर्मियों मे गिनती के पचास दिन यहीं बिताना
धूप मे खेल कर स्वयं को भुजंग बनाना
दादी के स्कूल मे अपने गर्द शहरीपन का
बेमतलब मे रौब जमाना...
और सबसे यादगार तो है
चाची के हाथों से बना ‘पूरा खाना’
बनता वही था
दाल-चावल-सब्ज़ी-रोटी रोज़ाना
मगर स्वाद हर बार एकदम नया...
फिर रात मे एक बड़ा गिलास दूध का
जिसमे चीनी के साथ होती थी
चाची के प्यार की ममताभरी मिठास...
सच! अच्छे दिन तो वे ही थे...
घर के मंदिर मे हर छोटा-बड़ा त्योहार
भाई-बहनों संग उमंग से मनाना...
शिवरात्रि मे ‘शंकरजी’ के लिए
कुएं से ढेर सारा पानी निकालना...
होली-दिवाली पे
चाचा के सानिध्य मे
रंग खेलना और पटाखे फोड़ना...
बहुत याद आता है सब
मंदिर मे जड़ी भगवानों की मूर्तियाँ
वैसी की वैसी ही हैं- पूर्णतः शांत
बस कुछ बदला है तो
बदले हैं गाँव के लोग
जो ‘हम’ से ‘मैं’ हो गए
मैं, मेरे अपने भी है उसमे
या कि जैसे
शिक्षित होने के साथ
हम भाई-बहन सच मे ‘कज़िन’ हो गए....
बैठा हूँ उसी मंदिर पे ,
लगता है जैसे वही बचपन जी रहा हूँ अभी...
यहीं रह जाने का मन करता है,
मगर दिलो-दिमाग ने
फिर धारण कर लिया चोला शहर का
और मेरा ‘शरीर’ चल पड़ा है फिर
शहर की ओर ... गाँव से दूर ...
@अभिषेक2015

Saturday, 8 March 2014

नारी

ललचाती आँखों को,
चीरते हुए वह,
बढ़ती जाती मंज़िल की ओर,
ठंड मे भी माथे पर पसीना,
और शंकामय मन लिए,
सामने देखकर भी दाएँ-बाएँ
की आहटे लेते लेती वह,
बढ़ती जाती मंज़िल की ओर,
डूबते सूरज के साथ
डूबता जाता उसका भरोसा, और
शाम ढलते ही हर ‘पुरुष’ उसे
एक ‘शिकारी’ सा दिखता, सोचती
न जाने कब-कौन-कहाँ पर
अपना ‘शिकारी पंजा’ मार दे, या
तेजाब फेंक मेरा
चेहरा ही बिगड़ दे।
पर अगले ही पल उसे
सुनाई देती एक आवाज़- बोली,
‘तू अब अबला थोड़ी है,
व्यर्थ क्यों डरती है?, अब
न कोई लाचारी न ही तू बेचारी है’, फिर
समझ गयी वह ‘शक्ति’ है,
जिसके बिना संसार महत्वहीन है,
वह ‘नारी’ है, ‘नारी’ है।

       .......................................@अभिषेक अवस्थी2014

Friday, 14 February 2014

स्पर्श तुम्हारा


स्पर्श तुम्हारा

सपर्श तुम्हारा
जैसे जीवन धारा,
है जग सारा।

है छाँव धूप,
जीवन का प्रारूप,
मेरा स्वरूप।

जागी उमंग,
महका हर अंग,
उठी तरंग।

नया है रंग,
स्पर्श तुम्हारा संग,
बजा मृदंग।

सपर्श तुम्हारा
जैसे जीवन धारा,
है जग सारा।

खिलती कली,
कर्णप्रिए काकली,
खुशी विरली।

मस्त गोधुली,
अब मन मे पली,
हर्ष को चली।

ईश्वर है मिला,
जीवन मेरा खिला,
आगे मैं चला।

मैं डूब चला,
हूँ सबकुछ भुला,
स्पर्श मिला।

सपर्श तुम्हारा
जैसे जीवन धारा,
है जग सारा।

@2014अभिषेक अवस्थी