स्पर्श तुम्हारा
सपर्श तुम्हारा
जैसे जीवन धारा,
है जग सारा।
है छाँव धूप,
जीवन का प्रारूप,
मेरा स्वरूप।
जागी उमंग,
महका हर अंग,
उठी तरंग।
नया है रंग,
स्पर्श तुम्हारा संग,
बजा मृदंग।
सपर्श तुम्हारा
जैसे जीवन धारा,
है जग सारा।
खिलती कली,
कर्णप्रिए काकली,
खुशी विरली।
मस्त गोधुली,
अब मन मे पली,
हर्ष को चली।
ईश्वर है मिला,
जीवन मेरा खिला,
आगे मैं चला।
मैं डूब चला,
हूँ सबकुछ भुला,
स्पर्श मिला।
सपर्श तुम्हारा
जैसे जीवन धारा,
है जग सारा।
@2014अभिषेक अवस्थी
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