Tuesday, 26 August 2014

जाएँ तो जाएँ किधर, हाय! रे सीरियल किलर...

जाएँ तो जाएँ किधर, हाय! रे सीरियल किलर...
अरे! आप नाहक न घबराएँ। मैं किसी क्रमिक हत्यारे की बात नहीं कर रहा हूँ। ऐसे लोग तो भारत मे ज़ाबज़ा पाए जाते हैं। कुछ खादीधारक और महंगाई डायन उन्हीं मे से एक है। अब तो प्याज़ और टमाटर ने भी आमजन के स्वाद की हत्या कर दी है। ये उन्हीं को नसीब है, जिनके गाल लाल होते हैं। 
खैर, टमाटर-प्याज़ की मूल्यवृद्धि तो किसी बड़े नेता की संपत्ति की भांति, वर्षानुवर्ष घटित होने वाली  एक सामान्य घटना है। यहाँ बात हो रही है घर घर मे चल रहे (या यूँ कहें कि बस रहे) परम (अ)पूजनीय हाफिज़ और बगदादी से ज़्यादा ख़तरनाक सिरियल किलर की। ये हमारे आपके घरों मे ऐसे कुंडली मारे बैठा है, जैसे कोई आम साँप किसी नागमणि को दबाये बैठा हो। हम जैसे कलमघिस्सुओं को बुद्धू बक्से (टी.वी.) मे दिखाए जा रहे ये डेली सोप्स बड़े जानलेवा लगते हैं।
कभी कभार तो मुझे लगता है कि विद्यार्थियों को इतिहास के कुछ पाठ पढ़ाने मे शिक्षक व्यर्थ ही मेहनत करते हैं। स्कूल मे एक टी वी ही रख देना चाहिए। महाभारत, महाराणा प्रताप, अशोक, चाणक्य, चन्द्रगुप्त और अकबर आदि पर आधारित विषयों का ज्ञानार्जन छात्र स्वयं ही कर लेंगे। बच्चे तो अब सब कुछ टी वी से ही सीख रहे हैं न। एक दिन मैंने अपने मित्र के सुपुत्र से राह   चलते अकबर के बारे मे पूछ लिया, तो उसका उत्तर सुन मेरा इतिहास का ज्ञान पानी भरने लगा। उसने कहा कि अकबर शहँशाह ए हिन्द था। वह ऐसा बादशाह था, जो जोधा के आगे पीछे घूमता रहता था। आवाज़ मे खराश के बावजूद भी उसकी डायलॉग डिलिवरी कमाल की हुआ करती थी। वो पंद्रह बीस सैनिकों की सेना साथ ही युद्ध करने निकल पड़ता था। मैंने उससे आग्रह किया कि ज़रा भारत के वीर पुत्र महाराणा प्रताप के बारे मे भी अपना टीवीनुमा ज्ञान साझा करे। वह खुश होते हुए बोला- प्रताप सच मे भारत का वीर पुत्र था। हमारे जैसी पंद्रह वर्ष की बाली उमरिया मे ही वो फूल और अजब के मध्य गज़ब का संतुलन बनाना सीख गया था और वीरता से उसका निर्वाह कर रहा था।    
उधर दूसरी ओर, हर धारावाहिक मे करोड़पति परिवार मे सास या बहू किसी आतंकवादी सरगना से कमतर नहीं लगती। बैठे बिठाये ये सास और बहुएँ एक दूसरे को मात देने हेतु नूतन पैंतरे सीखती है। टी वी के साथ साथ हमारे आपके घरों मे भी खटराग रोज़ाना अलापा जाता है। आजकल के धारावाहिक तो जैसे समाप्त होने का नाम ही नहीं लेते। वे महंगाई, भ्रष्टाचार और अत्याचार की भांति बढ़ते ही जा रहे हैं। लगभग सभी धारावाहिकों मे कहानी और लंबाई मे गज़ब की एकता दिखती है। कमाल की बात ये है कि ये धारावाहिक बनाने वाले अर्थशास्त्र के बड़े ज्ञाता होते हैं। मांग और आपूर्ति के बीच लोचदार संतुलन बनाए रखते हैं। ये जानते हैं कि जनता सदैव एक उदासीन वक्र ही रहेगी। कई बार तो ऐसा होता है कि जिसे हम बेटा/बेटी समझते हैं, वह पिता/माँ निकलते हैं। यदि नायक और नायिकाएँ दो तीन बार मरने के पश्चात पुनर्जन्म न लें, तो समझो नाटक मे दम नहीं रहा। नए ट्रेन्डानुसार कई धारावाहिकों को सरकारी पंचवर्षीय योजनाओं की भांति आगे खिसखाने का कार्यक्रम अनवरत जारी है। हर माह एक नया चैनल और सीरियल उत्पन्न हो जाता है। कभी कभी तो लगता है, मानों इन सीरियल्स ने भारत की बढ़ती आबादी के आंकड़े को ठेंगा दिखाने की ठानी हो।
आलम यह है कि अब तो आदमी अपने कार्यालय से घर पहुंचता है, तो उसे ठंडे खाने से ही संतोष करना पड़ता है। घर की सारी महिलाएं अपने पसंदीदा कार्यक्रम देखने के लिए भोजन की व्यवस्था घंटों पहले ही कर देती हैं। पुरुषों को इसी बात से संतोष करना पड़ता है कि इस टी वी के कारण दिन के कुछ घंटे उन्हे शांतिपूर्वक व्यतीत करने को मिल जाते हैं।
मेरे पड़ोसी शर्मा जी छुट्टियों मे परिवार समेत किसी फूहड़ रियालिटी शो मे जाने का प्लान बना रहे हैं। वे यह जान कर खुश हो रहे हैं कि दर्शक बनने के भी पैसे मिलते हैं। छुट्टियों का अच्छा उपयोग हो जाएगा। कुछ घंटे दर्शक बनेंगे और कुछ घंटे मौज मस्ती करेंगे। मैंने उन्हें बता दिया है कि पूरा प्रबंध कर के जाएँ। मसलन भोजन की व्यवस्था सुदृढ़ कर लें और पानी जैसे तरल पदार्थ कम लें। पता नहीं स्टुडियो के बाहर कब निकलने दिया जाए।

-    अभिषेक अवस्थी


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