Monday, 4 August 2014

आगे कुआं पीछे खाई...

आगे कुआँ पीछे खाई...
जनता अब जनार्दन नहीं रह गयी है। वह एक ऐसी फुटबॉल बन गयी है, जिसे राजनीति के मारीडोना और मेसी अपने अपने पाले मे करने के लिए लतियाते रहते हैं। जनता अर्थात हम, जिनको न चाहते हुए भी तथाकथित जनसेवकों की लाते खानी पड़ती हैं, और हम विवश हो उनकी बातें मान लेते हैं। जनता की हालत उस गधे के माफिक हो गयी है, जो अपनी समझदारी के चक्कर मे न घर का रहता, न घाट का। इसी राजनैतिक उठापटक मे मेरे कई मित्र एवं पड़ोसी अपना रोना रोते दिखाई दे रहे हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार का बजट आने के पश्चात ही पड़ोसी शर्मा जी के बच्चे चुन्नू और मुनिया उनपर ऐसे बरसे, जैसे आजकल आसमान से आग बरस रही है। वे कुछ कुछ डिप्रेशन का शिकार भी हो रहे थे। इसी तनाव के चलते एक दिन चुन्नू ने अपने गुस्से, दुख और कुंठा की चटनी बनाई और शब्द बाणों मे लपेट दुखी मन के धनुष से शर्मा जी पर वार किया। उसने कहा, पापा, मेरे सारे हसीन सपने आप लोगों के डीसीजन के कारण चूर चूर हो गए...आप से कितनी बार कहा था कि बहुत सोच समझ कर वोट देना... पड़ गए न लेने के देने। यह कहते कहते चुन्नू की आँखों से टी वी की उस नायिका की भांति गंगा जमुना बहने लगीं, जिसका शादी के पश्चात कनाडा जाने का सपना टूट जाता है। शर्मा जी को एफ. बी. आई. की भांति अपने बेटे द्वारा किए जाने वाले हमले का पूर्वाभास था। सो वे आधुनिक युग के आज्ञाकारी बाप की तरह अपना मुंह सीए बैठे थे। चुन्नू ने आगे कहा, सोचा था... किसी तरह बारहवीं पास कर के एक लैपटॉप पाऊँगा...फेसबुक पे डेली नयी गर्लफ्रेंड बनाऊँगा...रात भर उनसे चेटिंग...कुछ सेटिंग करूंगा...अपनी और दोस्तों की पसंद की देसी, विदेशी, नीली, पीली, हर तरह की रंगीली फिल्म देखूंगा। लेकिन आपने भाजपा को वोट देकर सारा बेड़ा गर्क कर दिया। शर्मा जी अपने पुत्र की मनोदशा का एहसास कर, हल्कान हुए जा रहे थे। अपराध बोध के चलते उनकी आंखे ज़मीन पर ऐसे गड़ी जा रहीं थी, जैसी अभी ड्रिल कर के धरातल का सारा पानी बाहर निकाल देंगे। रेडियो पे गाना बज रहा था- तेरे नैना दगाबाज रे...।
उधर शर्माईन को मुनिया की खरी खोटी सुननी पड़ रही थी। राजधानी एक्सप्रेस की भांति वह अपने दिल की एसिड रेन बरसाते हुए बोली, मम्मा!! ये बहुत गलत किया आपने...नॉट फेयर। सोचा था कि इस बार कन्या विद्या धन, मैं अपनी फ्रेमिंग’, डिज़ाइनिंग’, और पैकिंग पे खर्च करूंगी। मुफ्त मे करीना बन, कॉलेज जाऊँगी...लेकिन नही, आप को कहाँ मंजूर था? चलो माना कि हम यू पी मे कोई खास सुरक्षित नहीं हैं। बिजली नहीं, पानी नहीं, लेकिन फ्री का लैपटॉप और धन तो था न। सोचा था, कॉलेज जाने से पहले ढेर सारी शॉपिंग करूंगी...अपने नए पुराने बॉयफ्रेंड्स को कुछ गिफ्ट्स दूँगी...और बदले मे मोटिवेट होकर, वे भी मुझपर धनवर्षा करेंगे... आई हेट यू बोथ... अब आप को ही इस नुकसान का हरजाना भरना पड़ेगा
ऐसे कई चुन्नू और मुनिया ने तो अपनी भड़ास अपने अभिभावकों पे निकाल ली, किन्तु कई शर्मा जी टाइप लोग बहुत परेशान हैं। उनका तथाकथित अच्छे दिन वाला ख्वाब अब मलेशियाई विमान की तरह लापता होता दिख रहा है। ट्रैवलिंग की जॉब वाले कई शर्मा जी, रेल किराए को लेकर तनावग्रस्त हैं। शर्माईन इन सबसे अलग, आलू, प्याज़, गैस और चीनी के लिए आब ए चश्म हुई जा रही हैं।
मेरे मित्र खन्ना के दोनों पुत्र तो अब बेरोजगारी का दंश झेलने पर विवश हैं। बेरोजगारी भत्ते से जो मज़े किए हैं, और बैठे बैठे खाने की जो लत लग गई थी, सरकार अब उसका गिन गिन के हिसाब चुकता करने पर अमादा है। खन्ना साहब के पुत्र अब अपना सिर पकड़े बैठे हैं, और आज तक मे    मित्रों मैं तो पी एम बन गया, पी एम बन के कैसा तन गया देख आँखों से भाकरा नंगल डैम का पानी बहा रहे हैं।
जनता अब करे भी तो क्या करे। उसे दिल्ली कुआँ, तो प्रदेश खाई समान प्रतीत हो रही है। इन सब के बावजूद जनता अब भी आशावान है। वह हमेशा की तरह, अगले पाँच वर्ष भी अच्छे दिनों के लिए प्रतीक्षारत रहेगी। वह अपने मूल कर्तव्य प्रतीक्षा” का निर्वहन निष्ठापूर्वक करती रहेगी। वह केंद्र एवं राज्य जैसे कुएं और खाई के बीच अपना संतुलन बनाए रखने का भरपूर प्रयास करती रहेगी।    
                                               @अभिषेक अवस्थी2014 

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