Monday, 8 June 2015

Amar Ujala
स्वप्नलोक मे शिवजी, ताजमहल और मैं! (परिवर्धित लेख)
मैं सरकार की भांति सत्ता के पालने मे गहरी नींद के आगोश मे था। न जाने कब स्वप्नलोक मे विचरण हेतु पहुँच गया। यकायक मुझे भगवान शिव मेरी ओर आते दिखे। मेरी आश्चर्यमय प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही न रहा। न तो मैं प्रतिदिन मंदिर जाता हूँ। न ही सोमवार को शिवलिंग पे दूध बहाता हूँ। बावजूद इसके, भोलेभंडारी मुझे दर्शन दे रहे हैं। कलयुग मे मेरे जैसे सामान्य मनुष्य को भगवान के दर्शन होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। मैंने तो पुण्य टाइप कोई ‘कांड’ भी नहीं किया। अंजाने मे ही सही, पापी तो मैं भी हूँ। लगता है भगवान(नों?) को भी जनता की प्रवृत्ति सी हो चली है। जैसे जनता हर बार कम भ्रष्टाचारी को अपना नेता चुनती है, वैसे ही भगवान भी कम पापी को भक्त समझ बैठे।
समीप आते ही मैं भगवान के चरणों मे लोट गया। बोला- प्रभु! अहो भाग्य हमारे, जो आप पधारे। किन्तु प्रभु! आप तो भगवान हैं, अंतर्यामी हैं। आपका नेटवर्क तो ‘फाइव-जी’ से कहीं अधिक शक्तिशाली है। ऊपर से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा अपने ‘मन की बात’ कह देते। शिवजी रहस्यमयी मुस्कान ढीलते हुए बोले- ‘क्या करूँ पुत्र!, मनुष्यों के कारण जो अत्याचार और घृणा के काले-घने बादल छाए हैं, वे अब ब्रह्मांड मे भी अपने पाँव पसार रहे हैं। फलस्वरूप हमारे यहाँ भी नेटवर्क की भारी समस्या उत्पन्न हो गयी। इधर गुज़रते हुए त्रिनेत्र ने वाईफाई के तगड़े और फ्री नेटवर्क के संकेत दिए।
उनकी रहस्यमयी मुस्कान देख मैंने पूछा- हे पालनहार! क्या हुआ? आप इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जो छुपा रहे हो? 
वे बोले- ‘पुत्र! क्या बताऊँ। जैसे ही मेरी जटाओं ने वाईफाई का नेटवर्क पकड़ा, भारतभूमि से जुड़ी अनगिनत अधिसूचआएँ मेरे मन-मष्तिष्क की घंटी प्रतिपल बजा रहीं हैं। इतनी घन्टियां तो मैने किसी सोमवार अथवा शिवरात्रि मे भी नही सुनी’। मैने कहा- किंतु प्रभु! आपको तो प्रसन्न होना चाहिए न। भक्तों की तादात जितनी बढ़े, उतना अच्छा। आजकल इन्द्रदेव फ़िर से अनियंत्रित हो रहे हैं। इधर सरकार और उधर से वर्षा का हाहाकार। न जाने कितनी ही घन्टियां तो इस देश के किसान ही बजा रहे होंगे। जो बजाते-बजाते थक गए, इन्द्रदेव से प्रत्यक्षतः निपटने स्वर्गलोक निकल गए। शंकर जी सीरीयस मोड मे आ गए। बोले- ‘बात वो नही है। किसान तो सदैव ही परेशान रहता है। इसमे इन्द्र को मत घसीटो’। मैने कहा- तो ठीक है प्रभु मुद्दे पे आइए। कहने लगे- दरसल, वाईफाई ऑन होते ही यकायक अजीब से नोटिफिकेशन आए। अच्छा खासा ताजमहल बना हुआ है। उसके नीचे मेरे होने की बात कही जा रही है। मैं तो सर्वत्र हूँ। अनावश्यक चक्करों मे मुझे फँसाया जाता है। चिंता तो होगी ही न? विद्यालयों मे इतना रटाया जाता है कि भैया ईश्वर-अल्लाह सब एक हैं। किंतु न! तुमलोगों को कुछ याद ही कहाँ रहता है। कभी बाबरी, कभी शिवमंदिर, कभी राममंदिर। बस कोई न कोई बहाना चाहिए लड़ने का। लाइमलाइट मे रहने का। अब ताजमहल को ही लपेटे लिया। अरे भाई, इतनी ख़ूबसूरत इमारत है। सब मिलकर उसके जैसा सुंदर हृदय रखो। और फ़िर ताजमहल के अंदर मैं हूँ या मेरे अंदर ताज, बात तो समान ही रहेगी कल और आज’।
इससे पहले कि प्रभु गुस्से मे तांडव जैसा कुछ कर बैठते, मैने मामला सम्भालते हुए कहा- अब आप ही कुछ उपाय बताएँ प्रभु! वे बोले- उपाय अत्यंत सरल है। 'धर्मगुरुघंटालों' और नेताओं को चाहिए कि शांति'स्वरूप' और  प्रेम'योगी' बनकर जीवन का असल ‘आनंद’ लें और सबको दें। सौहार्द और सहयोग को 'साक्षी' मानकर 'आज़म-ए-ओवैसी' कहलाएं। 
शंकरजी की बातें सुनकर मुझे लगा कि कहीं वे भावुकता मे बह न जाएँ। मैने उन्हें बीच मे रोक कर कहा- हे प्रभु! ये नामुमकिन है। हमारे यहाँ इंसान को बनाने वाले भगवान बदले जाते हैं। इंसान नही बदले जाते है। आपको कोई ठोस क़दम ही उठाना होगा। इतना सुनते ही भोलेनाथ ने नन्दी को आवाज़ लगायी और जाने को तैयार हुए। भगवान कब ठोस क़दम उठाएंगे, ये न पता चला किंतु नन्दी ने मुझपे एक लात देमारी और मुझे स्वप्न्लोक से बाहर फेंक दिया।
                                  -अभिषेक अवस्थी



Thursday, 4 June 2015

नई दुनिया - अधबीच 04-06-15
ये आरक्षण का जिन्न जब तब बोतल से बाहर निकल आता है। सरकार अलादीन की भांति इसे तमाम जद्दोजहद करके हर बार बोतल मे बंद करती है। परंतु ये है कि गुलामी पसंद नहीं करता है। अपने चाहने वालों की सहायता से यह हर बार बोतल का ढक्कन खोल, कुछ तूफानी करने को आतुर हो जाता है। इस जिन्न का ‘इस्तेमाल’ करने वाले सहायक नाम के प्राणी भी कम नही हैं। जब-जब इनको लगता है कि मेहनत, शिक्षा और पराए सुख से इन्हें कष्ट है, तब-तब ये आरक्षण के जिन्न को ‘पेरोल’ पे आज़ाद करवाते हैं। तदुपरान्त रेलवे की पटरियों पे ये दोनों मिलकर अपना तांडव करते हैं। जिन्न को दूल्हे का रूप देकर अपने मतलब की घोड़ी को रेलवे ट्रैक पर दौड़ाते हुए, सरकारी दुल्हन तक पहुंचाया जाता है। प्रदर्शनकारी बारातियों को ये पूरा भरोसा रहता है कि भारत भर के रेलवे ट्रैक पर उनका मालिकाना हक़ है।
पिछले दिनों मैं भी एक ऐसे ही प्रसंग मे फंसा था। दरअसल हुआ यूँ कि जिस ट्रेन से मैं सफर कर रहा था, वह अचानक किसी वीरान जगह पे रुक गयी। रुकना कोई नई बात नहीं है। लेकिन किसी प्राइवेट अस्पताल की तरह साफ-सुथरे मौसम मे, एक सुपर फास्ट एक्सप्रेस ट्रेन का चार घंटे से ऊपर यथास्थान खड़े रहना अवश्य ही नयी बात है। अरे! एक रेलगाड़ी ही है न! कोई देश की गरीबी तो है नहीं कि जो अड़ियल बनकर एक ही स्थान पे टिकी रहे। न नीचे खिसकती है न ऊपर। मुई वहीं की वहीं धरी है। ख़ैर, जैसा की सदैव होता है, ट्रेन रुकते ही मेरी बोगी के अधिकांश ‘मर्द’ अपने माथे पे प्रश्नसूचक उभारते हुए नीचे उतार गए। ट्रेन रुकने पर मर्द अक्सर द्रुतगामी हो जाते हैं। वे आविलम्ब इंजन की ओर ऐसे लपकते हैं जैसे रेलवे का सम्पूर्ण अतलस्पर्शी ज्ञान उन्हें ही प्राप्त हो। कुछ महानुभाव तो इतना कॉन्फिडेंटली अपने क़दम इंजन की ओर बढ़ाते हैं, जैसे हर समस्या का निदान उनके पास ही उपलब्ध हो। गोया कि लोकोपायलट का पूरा कोर्स उन्होने आत्मसात किया है। यदि ड्राईवर बीमार हो गया तो वे ही गाड़ी ले उड़ेंगे। मैने भी अपना आलस्य त्यागा। मांजरा समझने हेतु खरामा-खरामा इंजन की ओर बढ़ा। पता चला कि कुछ प्रदर्शनकारी ट्रेन के आगे कटने को तैयार ‘पड़े’ थे। पास मे ही एक नौजवान प्रदर्शनकारी कोलड्रिंक पीता दिखा। समय बिताने के लिए मैंने उसे पकड़ा। सवाल जवाब शुरू हुए।
मैंने पूछा, ‘तुम तो अच्छे खासे नौजवान हो। मेहनत करो, पढ़ाई करो। उसके दम पे नौकरी पाओ। ये आडंबर क्यों?’
‘तो अभी भी तो मेहनत ही तो कर रहें हैं न बाबूजी...!’ युवक ने उत्तर मे कहा, ‘इत्ती धूप मे चेहरा लाल हुआ जा रहा है...जब औरों को आरक्षण मिल रहा है, तो हमारी बिरादरी को भी मिलना चाहिए न!’
‘इससे तुम्हें क्या फायदा क्या होगा?’
‘अजी! ज़ाहिर सी बात है...इत्ती रगड़म-रगड़ाई न करनी पड़ेगी। नंबर कम भी आएंगे तो आरक्षण को ढाल बनाकर नौकरी के चक्रव्युह को तोड़ देंगे...’
‘फिर तुम्हें आरक्षण मिलने के बाद, दूसरी बीरादरी वाले हल्ला मचाने लगेंगे,’ मैंने कहा।
वह बोला, ‘जी! मचाने दो हल्ला। वो भी मांगे आरक्षण...देखी जाए तो हम तो उनका भला ही करने निकले हैं जी...तुलसीदास कह गए हैं, “पर हित सरिस धर्म नहिं भाई” अर्थात...
‘इस पंक्ति का अर्थ मैं जानता हूँ’ मैंने उसे बीच मे रोकते हुए कहा, ‘तुमलोग स्वार्थी हो रहे हो... तुलसीदास जी तो यह भी कह गए हैं कि “पर पीड़ा सम नहिं अधमाई”। तुम्हारे कारण लाखों रेल यात्री व्यथित हैं। रेलवे का घाटा बढ़ रहा है...करोड़ों का नुकसान...’
‘ओ बाबूजी...’ इस बार बीच मे रोकने की बारी नौजवान की थी, सो वह बीच मे बोला, ‘ज़्यादा ज्ञान न बघारो... इत्ता ही ज़्यादा है तो सरकार मे बाँट दो... हम तो प्रदर्शन करते रहेंगे...दम हो तो ट्रेन हमारे ऊपर से ही चलवा दो...वरना बस पकड़ लो...ट्रेन तो हम न चलने देंगे जी...’
उसकी बातों का जवाब यही था कि मैं चुपचाप बस ही पकड़ लूँ। सोच रहा हूँ, तमाम रेलयात्रियों की ओर से रेल मंत्रालय को एक ‘रायनुमा’ पत्र लिखूँ। पत्र द्वारा मैं रेल मंत्रालय से विनम्र निवेदन करूंगा कि हर राज्य के हर शहर मे अलग से रेलवे ट्रैक का निर्माण हो। वहाँ कृत्रिम ट्रेनें चलें। एक अधिसूचना ज़ारी की जाए कि ये रेल ट्रैक सिर्फ और सिर्फ, प्रदर्शनकारियों के लिए विशेष रूप से निर्मित किया गया है। अतः, सभी छात्रनेताओं, किसाननेताओं, धर्मनेताओं, और प्रदर्शनप्रेमियों, को यह अधिकार है कि वे धरना और विरोध प्रदर्शन, जीत और हार प्रदर्शन, यहाँ तक कि जो अप्रदर्शनीय है, उसका भी प्रदर्शन करें। बाकी, चुनावकाल मे सरकार सबकी सुनती भी है, और वादों को ड्राफ्ट भी करती है।

Wednesday, 3 June 2015

हैप्पी बड्डे सरकार...

हैप्पी बड्डे सरकार...
सुना है सरकार का बड्डे है, वो भी हैप्पी वाला! कमाल है जी, राष्ट्रीय छुट्टी भी नही घोषित हुई। अच्छे दिन, बुलेट ट्रेन काला धन आदि नही आए, न सही। किंतु भई, पहले जन्मदिन के उपलक्ष्य मे आम टाइप वाले भाइयों, बहनों और मित्रों को एक अदद केक का टुकड़ा ही डाल देते। ख़ैर, जहां देखा चारा वहां मुँह मारा की तर्ज़ पर एक नामी न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर, सरकार को जन्मदिन की बधाई देने के बहाने उनका साक्षात्कार कर लाए। उसी का कुछ भाग पेश-ए-खिदमत है-  
रिपोर्टर- सरकारश्री, आपको जन्मदिन की बधाई।
सरकर- ठीक है, अपने 'केक का टुकड़ा' लो और अपनी पर आ जाओ।
रिपोर्टर- आप एक वर्ष के हो गए। कैसा लग रहा है।
सरकर- सबकुछ नया नया सा लग रहा है। अभी तो पूरी दुनिया देखनी बाकी है। रिपोर्टर- तो आगे की क्या योजना है? सरकार - कहा न! दुनिया देखनी है, जश्न मनाना है, सरकार रूपी जन्म बार बार थोड़ी न मिलता है भाई।
रिपोर्टर- और कितने दिन जश्न मनाएंगे? सरकार- जब तक बालिग नही हो जाते।
रिपोर्टर - अच्छा, ये मेक इन इंडिया का बड़ा शोर है। लेकिन जमीनी स्तर पे कुछ होता तो दिख नही रहा।
सरकार- क्यों नही होता दिख रहा है?  आदमी साल भर से बन रहा है, और हम बना रहे हैं। तो हुआ न मेक इन इंडिया?
रिपोर्टर- तो ऐसे विकास कैसे होगा? सरकार- देखो, हर आदमी का विकास स्वयं उसका ही दायित्व है। इसमे हम क्या करें? हम तो 'अपने' विकास के दायित्व को तत्परता से पूर्ण करने हेतु शपथबद्ध हैं। रिपोर्टर- ओह! इस विषय मे थोड़ा विस्तार से बताइए।
सरकार- तुम रिपोर्टर लोग हमेशा बाल की खाल निकालने मे लगे रहते हो। देखो, हमने न्यायपालिका को लगभग अपने कब्जे मे कर लिया है। तुम लोगो को तो पता ही होगा, कैसे दनादन फैसले पे फैसले आ रहे हैं आजकल। एक दोहा टाइप सुनो, " पावर और पैसे का, ऐसा देखा मेल... तेरह साल मे जेल हुई,घंटे भर मे बेल..." हम तो इसी दोहे पे भरोसा रखते हैं। वो जुमला तो सुना होगा न "सबका साथ, सबका विकास"। बस थोड़ा फ़ेरबदल हुआ है उसमे। अब हो गया है, "सबका साथ,अपना विकास" रिपोर्टर- आपका जन्म हुए एक वर्ष बीत गया है। क्या कुछ ख़ास हुआ आपके साथ या आपने क्या ख़ास किया? सरकार- बहुत कुछ ख़ास किया हमने। योजनाओं पे योजनाएँ लॉन्च करी। जैसे जनधन योजना। जनता का धन, पहले बैंकों मे जाएगा, फ़िर व्यापारियों के पास, तत्पश्चात जोड़जाड़ के हमारे पास आयेगा। हमने ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं करी। स्वच्छता अभियान लॉन्च किया। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ मिशन लॉन्च किया। और तो और मंगल यान भी हमने ही लॉन्च किया।
रिपोर्टर- लेकिन स्वच्छता तो चुनावी जुमला टाइप हो गयी है। जमीनी स्तर पे दिखती ही नही है। और बेटियां पढ़ने-बचने की बजाय मर-कट रहीं हैं।
सरकार- देखो, दोनों ही मामलों मे हम यही कहेंगे कि आदमी का विकास उसका ख़ुद का काम है।
रिपोर्टर- अच्छा, आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? सरकार- जी, 'घोषणा' को 'चुनावी जुमला' सिद्ध करना। जनता मे अब भी यह विश्वास बनाए रखना कि अच्छे दिन आएँगे।
रिपोर्टर- हमारे न्यूज़ चैनल के माध्यम से आप अपने जन्मदिन पर जनता को कुछ संदेश देना चाहेंगे। सरकार- जी ज़रूर। मित्रों... अच्छे दिन आएँगे। अवश्य आएँगे, बस हमें बालिग होने दीजिए। अच्छे  दिन बुलेट ट्रेन की गति से आएँगे। हाँ, आप ध्यान रखें कि काला चश्मा धारण न करें। वरना बुलेट ट्रेन की गति से आ रहे अच्छे दिन आपको दिखेंगे नही। फ़िर आप हम पे दोषारोपण करेंगे कि अच्छे दिन सरपट निकल गए और बुलेट ट्रेन आप को ही रौंद कर, विदेश भ्रमण पे निकल गयी। धन्यवाद!          
                        -अभिषेक अवस्थी

Thursday, 7 May 2015

किस्सा लोकपाल और लोकतंत्र का...


किस्सा लोकपाल और लोकतंत्र का...
एक बार की बात है। आंदोलन नामक व्यक्ति के दो सुपुत्र थे। एक का नाम था लोकतंत्र और दूसरे का लोकपाल। कहने को लोकतंत्र बड़ा था किंतु अपने क्रियाकलापों के कारण लोकपाल ही बड़ा माना जाता था। वह लोकतंत्र और उसके मित्रों पे निरंतर नज़र रखता था। वह चाहता था कि उसका भाई चाह कर भी कुछ ग़लत न करे। कोई भी गलती होती तो फौरन पिताजी से शिकायत हो जाती। नामानुसार पिताजी आंदोलन कर डालते और सुपुत्र को कुपुत्र होने से बचा लेते। तीनों मे बड़ा सौहार्दपूर्ण सामंजस्य था। उनकी एकता, ईमानदारी एवं कमज़ोर के पक्ष मे लड़ने की शांतिपूर्ण कला के लिए वे दूर-दूर तक प्रख्यात हो गए थे। चहुंओर उनकी ही चर्चा थी। सब मन ही मन उन्हे अपना नेता और आदर्श मान बैठे थे।
उनकी अनवरत बढ़ती ख्याति से तमाम स्थानों की सरकारें और उनके नुमाइंदो की नाक-भौं सिकुड़ने लगी। उन्हे डर सताने लगा कि अगर ये लोग सत्ता के गलियारे मे चहलकदमी भी करने लगे तो उनकी दाल गलनी बंद हो जाएगी। मंत्रियों-सन्त्रियों ने मंत्रणा की। निष्कर्ष यह निकला कि तीनों को भ्रष्टाचारी, घोटालेबाजी जैसी मादक वस्तुएँ प्रदान की जाएँ। एक बार इनका नशा चढ़ गया तो छुड़ाए नही छूटता।
परंतु बाप-बेटे बड़े ज्ञानी एवं भविष्यद्रष्टा थे। उनके विशिष्ट सूत्रों से उन्हें सरकारों की यह चाल पता चल गयी। बस, बात ऐसे बिगड़ी कि बिगड़ती चली गयी। पिता ने सरकारों और उनकी नीतियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया और अपने नाम को शांतिपूर्वक सार्थकता प्रदान करने लगे। लोकपाल और लोकतंत्र ने अपने वकील, पत्रकार मित्रों के साथ एक बड़ा जनसमर्थन तैयार किया। अमूमन आम लोग सरकार से असंतुष्ट ही होते हैं। इनमें कुछ तो सरकार बनाने मे सहयोग देने वाले भी होते हैं। सब आंदोलन बाबू, लोकतंत्र और लोकपाल से जुड़ते चले गए। 
आंदोलन बाबू ने सरकार विरोधी धरने दिए। खराब नीतियों को हटाकर नयी नीतियां और सरकारी तंत्र मे पारदर्शिता लाने हेतु कई दिनों तक भूख हड़ताल भी की। उनके मुताबिक़ दुनिया या कि उनके देश का सबसे सच्चा, ईमानदार, साफ़दिल व्यक्ति सरकार की निगरानी करे। सरकार को घोटाले जैसे कृत्य करने से रोके। जो व्यक्ति इस क्रिया को सिद्ध कर सकता था, वह था आंदोलन बाबू का पुत्र लोकपाल। सो सभी लोकपाल की पैरवी करने लगे। नारेबाज़ी, पोस्टरबाज़ी, और सोशलमीडियाबाज़ी से चहुंओर इसका शोर होने लगा लोकपाल को सरकार के ऊपर बिठाना होगा। गोया इस देश की तरक्की तभी सम्भव होगी जब लोकपाल जैसा व्यक्ति प्रधानमंत्री से भी ऊपर के पद पर होगा। जैसे कि लगभग हर आदमी मे व्याप्त भ्रष्टाचार, दुष्कर्म, चोरी, डकैती, घरेलू हिंसा लोकपाल के आने पर रुक जाएगी। जैसे कि लोकपाल के आने पर लोग सड़कों पर थूकना बंद कर देंगे और यातायात के नियमों का कड़ाई से पालन करेंगे।
ख़ैर, इतना सब होने बावज़ूद सरकारों ने  बात नही मानी। आंदोलन बाबू ने थक हारकर घर वापसी का मन बनाया और और अपनी भूख प्यास मिटाई। उनके साथ लोकपाल भी चलना चाहता था। अचानक लोकतंत्र का माथा ठनका। कभी न बोलने वाला लोकतंत्र उस दिन बोलने लगा उसने औने भाई और पिता को समझाया - "देखो, अभी बहुत से सताये हुए लोग हमारे साथ हैं।यही मौका है कि हम कुछ बड़ा करें" 
आंदोलन बाबू ने पुत्र की मंशा जानते हुए भी उसे साफ-साफ समझाने को कहा। लोकतंत्र बोला "मैं चाहता हूँ कि हम एक पार्टी बनाए और चुनाव लड़ें।यदि जीत गए तो लोकपाल भाई को मैं उचित स्थान दिलाऊँगा। अपने देश को बदल दूँगा।" 
आंदोलन बाबू ने इसके लिए साफ इनकार कर दिया और घर वापसी कर गए। लोकपाल वही रुक गया ताकि अपने भाई की गतिविधियों मे वह भरपूर सहयोग कर सके।

चुनाव हुए। लोकतंत्र भारी बहुमत से  जीत गया। चारों ओर खुशी की लहर दौड़ गयी। लोकपाल भी ख़ुश था कि अंततः उसे उचित स्थान दिया जाएगा। लोकतंत्र ने अपने मित्रों से कहा कि हमें दूसरे दलों की भांति भ्रष्टाचारी, अत्याचारी और अहंकारी  नही बनना है। हमे तो सेवा करनी है।
लोकतंत्र ने शपथ ली। लोकपाल को अपने ऊपर बिठाया और उसे स्वतंत्रा से अपना काम करने को कहा।
कुछ ही दिन बीते होंगे कि लोकतंत्र की सरकार पर लोकपाल ने उँगली उठायी। जाँच बिठाई। लोकतंत्र को यह बात पसंद नही आयी। पसंद आनी भी नही थी। दरसल लोकतंत्र अब सत्ता और लोभ की क़ैद मे था। लोकतंत्र अब परतंत्र हुआ जा रहा था। अहंकारी परतंत्रतावादी लोकतंत्र को यह बात नागवार गुज़री कि कोई उसपर उँगली उठाए। परिणामस्वरूप उसने लोकपाल को बर्खास्त कर दिया। 
लोकपाल अपने ही भाई के इस कृत्य से अत्यधिक दुखी हुआ। वह अवसादग्रस्त हो गया। फ़िर उसका कहीँ कुछ पता नही चला। कूछ  महीनों बाद अखबारों मे सुर्ख़ियां बनी एक ख़बर आयी- "लोकतंत्र के भाई लोकपाल की संदिग्ध हालात मे मौत। प्रथमदृष्ट्या मामला आत्महत्या का लगता है। लोकतंत्र सदैव की तरह चुप्पी साध गए।" 
                                           - अभिषेक अवस्थी

Sunday, 19 April 2015

राजकुमार की घरवापसी...

राजकुमार की घरवापसी...
भले वे हार गए हों। भले ही उनकी गद्दी और साम्राज्य छिन गया हो। परंतु सत्य यही है कि तमाम लोगों के लिए वे अब भी एक राजकुमार ही हैं। वे स्वयं भी अपने कारनामों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से यही कहते रहे हैं। मीडिया से लेकर समर्थक और विरोधी, सब उनकी घरवापसी का जश्न अपने तरीके से मना रहे हैं। हो भी क्यों न। आखिर एक राजकुमार सत्ता से ‘विमुख’ होकर ‘तपस्योन्मुख’ हुआ। वह घोर तपस्या करने हाँगकाँग जैसे किसी चमकीले, तड़कीले एवं भड़कीले स्थान पर जो गया। यह कतई मज़ाक की बात नहीं कि तमाम शानोशौकत और मेनकाओं की उपस्थिति मे भी वह लगभग दो माह के लिए ‘ऋषि’ के रूप मे तपस्या करते रहे। बाकी ‘ये अंदर की बात है’। हम जैसे आम लोगो को जब देश के अंदर की बात नहीं ज्ञात नहीं होती तो भला विदेश मे क्या गुल खिलते हैं, इसका पता न कभी चल पाया था, न चल पाएगा। वो तो भला हो न्यूज़ वालों का कि ‘क्रिकेटर और उसकी गर्लफ्रेंड’ से फुर्सत मिलते ही उनके अदृश्य होने की तिथि, मिलने की तिथि और कारण समेत उसके बाद की स्थिति से हमे अवगत करवा दिया। महान लेखक शरद जोशीजी ने कहा है – ‘नियम की बात है कि हर तपस्या कुछ दिन बाद मज़े ज़रूर देती है।’ यह तय है कि मज़े मिलेंगे। यह बात दीगर है कि अब पाँच वर्ष प्रतीक्षारत रहना होगा। किन्तु मज़े मिलेंगे। क्योंकि मज़े देने वाले हम ‘आम-कुमार’ ही हैं। हमारे पास विकल्प कम होते हैं।
उनका लौटना एक चिंगारी सी है। बेरोज़गार हुए उनके समरर्थक रूपी कार्यकर्ता यकायक नौकरी बजाने निकल पड़े। गोया कि वे जीत सुनिश्चित करने का कोई फॉर्मूला लेकर लौटे हों। जो पटाखे ‘विजयावस्था’ मे फोड़ने का सपना था, वह तो पूरा न हुआ। दिवाली मे हार के गम के चलते पटाखे फोड़ने का मन न हुआ। विश्वकप ने भी मौका न दिया। लेदेकर अब मौका आया है। इससे पहले कि पटाखे एक्सपायर हो जाएँ उन्हे प्रयोग मे लाना ही होगा। सो सभी पिल पड़े। एक ऐसे ही विस्फोटक ‘समर्थक’ से मेरी भेंट हुई। मैंने जश्न का कारण पूछते हुए कहा – वे मात्र विदेश मे छुट्टियाँ व्यतीत कर के ही तो आए हैं। कौन सा इंद्रदेव को समझा कर आए है कि भारत के किसानों को बख्श दें? अथवा ऐसा क्या ले आए हैं कि चतुर्दिश उनके लौटने का ही चर्चा है? क्या वे अपने चिंतन और मंथन के थैले मे कालाधन वापस लाने की कोई सृदृढ़ योजना लाए हैं? वे बोले- ‘तब हारे तो हारे। यह दो महीने की तपस्या उनकी ‘नैतिक’ विजय है। उन्होने वहाँ जो चिंतन किया है, उसका मंथन अवश्य ही करेंगे। हम उसी का जश्न मना रहे हैं। इसमे आम लोगो का कोई स्थान नहीं है। अतः आप दूर रहें।’ मैं सदैव की भांति चुप रहा और खुश रहा। अपने घर की गली पकड़ कर मैंने घरवापसी तय करी।
घर लौटते हुए मैंने पाया कि कुछ विरोधी गुट के लोग भी नाच गाना कर रहे थे। वे भी पटाखे फोड़ रहे थे। अंतर यह थे कि समर्थकों के पटाखे बड़ी उदासीनता के साथ ऊपर जाकर बिना आवाज़ किए फूट रहे थे। विरोधियों के पटाखे दहाड़ते हुए फुट रहे थे। एक विरोधी से मैं पूछ बैठा, ‘भाई! राजकुमार तो उनके लौटे हैं। आप किस बात का जश्न बना रहे हैं? वह बोला – ‘जिनके कारण हमे गद्दी मिली है, जी वे लौट के घर आ गए हैं, तो खुशियाँ मनाना तो बनता है न! और वैसे भी अब वे आ गए हैं तो मीडिया वाले थोड़ा हंसी-ठिठोली भी कर लेंगे और कुछ दिन हमे चैन से रहने देंगे’।
मैंने सोचा कि बात तो बंदा सही कह रहा है। हंसी ठिठोली तो हो ही रही है। सारा फोकस किसानों की अत्महत्या, बर्बर व्यवस्था, लूट-मार, भ्रष्टाचार आदि से हटकर राजकुमार पे जो आ गया है।

                           -अभिषेक अवस्थी 

Wednesday, 31 December 2014

जब मैं गाँव आता हूँ

जब मैं गाँव आता हूँ ...// Abhishek
जब कभी लंबे अरसे के बाद
मैं गाँव आता हूँ,
ख़ुद-ब-ख़ुद ‘मैं’ से 
‘हम’ हो जाता हूँ...
उतार कर शहरी लबादा
और उसमे छुपे ढेरों अस्क़ाम
दिखावे से कोसों दूर,
मैं ख़ुद मे ख़ुद को पा जाता हूँ...
ख़लिश सी तो है
कि अब यहाँ कोई रहता नहीं
इस बड़े घर मे
जो धीरे धीर मकान हो रहा है,
फिर हमारी उम्र की तरह ही
खंडहर हो जाएगा...
लेकिन बड़ी यादें हैं यहाँ ,
गर्मियों मे गिनती के पचास दिन यहीं बिताना
धूप मे खेल कर स्वयं को भुजंग बनाना
दादी के स्कूल मे अपने गर्द शहरीपन का
बेमतलब मे रौब जमाना...
और सबसे यादगार तो है
चाची के हाथों से बना ‘पूरा खाना’
बनता वही था
दाल-चावल-सब्ज़ी-रोटी रोज़ाना
मगर स्वाद हर बार एकदम नया...
फिर रात मे एक बड़ा गिलास दूध का
जिसमे चीनी के साथ होती थी
चाची के प्यार की ममताभरी मिठास...
सच! अच्छे दिन तो वे ही थे...
घर के मंदिर मे हर छोटा-बड़ा त्योहार
भाई-बहनों संग उमंग से मनाना...
शिवरात्रि मे ‘शंकरजी’ के लिए
कुएं से ढेर सारा पानी निकालना...
होली-दिवाली पे
चाचा के सानिध्य मे
रंग खेलना और पटाखे फोड़ना...
बहुत याद आता है सब
मंदिर मे जड़ी भगवानों की मूर्तियाँ
वैसी की वैसी ही हैं- पूर्णतः शांत
बस कुछ बदला है तो
बदले हैं गाँव के लोग
जो ‘हम’ से ‘मैं’ हो गए
मैं, मेरे अपने भी है उसमे
या कि जैसे
शिक्षित होने के साथ
हम भाई-बहन सच मे ‘कज़िन’ हो गए....
बैठा हूँ उसी मंदिर पे ,
लगता है जैसे वही बचपन जी रहा हूँ अभी...
यहीं रह जाने का मन करता है,
मगर दिलो-दिमाग ने
फिर धारण कर लिया चोला शहर का
और मेरा ‘शरीर’ चल पड़ा है फिर
शहर की ओर ... गाँव से दूर ...
@अभिषेक2015

Tuesday, 30 December 2014

ठंड मे रेल यात्री और न्यूज़ एंकर...

ठंड मे रेल यात्री और न्यूज़ एंकर...
प्रतिदिन भिन्न-भिन्न न्यूज़ चैनलों के माध्यम से ज्ञात होता है कि वह दिन पिछले दशक मे सबसे ठंडा रहा। मुझे बड़ा ताज्जुब होता है कि जो न्यूज़चैनल परसों हुए बलात्कार के समाचार संग अपना तथाकथित आक्रोश दिखाते है, फिर दो दिन के पश्चात किसी क्रिकेटर और अभिनेत्री के रिश्तों पर अपना फोकस लौटा लाते हैं, वही न्यूज़ चैनल दस वर्ष पुराने आंकड़े भी सुरक्षित रखते हैं।
पिछले दिनों मैं कहीं जाने हेतु ट्रेन मे चढ़ा। ट्रेन को जबर्दस्त ठंड लगी हुई थी, सो बेचारी 12 घंटे विलंब से आई। चढ़ते ही ऐसा लगा जैसे संसद मे‘पक्ष’ गायब हो और ‘विपक्ष’ उपस्थित हो। अधिकतर सीटें खाली थीं और टीटी महोदय ‘उपचुनाव’ के यथोचित प्रत्याशी से यथासंभव लक्ष्मी वसूलने हेतु बोगी के दरवाजे पर जमे हुए थे। अपने शिकार को करीब आता देख वे चौकन्ने खड़े हो जाते, और अचानक सरकारी नौकर से ‘चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया’ की भूमिका मे आ जाते हैं। हमारे देश मे तीन लोग जब अपनी वर्दी मे होते हैं तो वे अमूमन स्वयं को ईश्वर-तुल्य मानते हैं। एक पुलिस का सिपाही, सरकारी डॉक्टर, और टीटी महोदय। ये प्राणी जब ‘ऑन ड्यूटी’ होते है तो अच्छे भले इंसान की ‘ब्यूटी’ बिगाड़ सकते हैं।
मैं बिस्तर लगा ही रहा था कि कोच मे धड़धड़ाते हुए एक न्यूज़ एंकर ऐसे घुसे जैसे टीवी पे एक दंतमंजन के विज्ञापन मे अदाकारा अपनी एंट्री मारती है। मुझे डर लगा कि कहीं वह एंकर मुझसे मेरे बंदरछाप दंतमंजन मे नमक होने के बारे मे पूछताछ न करने लगे। किन्तु जैसे काला धन आते-आते रुक गया, वैसे ही वो न्यूज़ एंकर अपने ‘विडियो जर्नलिस्ट’ के साथ दो बर्थ पहले ही रुक गया।
उसने पास बैठे बुज़ुर्ग से कहा, ‘चाचा, आप से कुछ प्रश्न करेंगे, फटाफट बिना बकलौली के उत्तर दीजिएगा।
चाचा भी कम न थे। ऐसे जवाब दिए कि ‘कपिलशर्मा’ भी उनके पैर पकड़ लें। बानगी पेश है-
एंकर: ये बताइये, ट्रेन लेट है क्या? कितना लेट है?
चाचा: आपने जांचा नहीं क्या? ऐसे ही हवा मे चढ़ गए। लेट है तभी तो आप से मिले, वरना घर मे आराम से सो रहे होते चारपाई पे।
एंकर: तो क्या परेशानी है आपको?
चाचा: जी गठिया का दर्द अपने चरम पे है।
एंकर: गठिया नहीं, ट्रेन लेट होने से जो परेशानी हुई, वो बताओ बुढ़ऊ।
चाचा: इत्ते कोहरे मे मरवाएंगे क्या? ड्राईवर अगर ट्रेन समय पर पहुंचाएंगे, तो हम यात्री घर की बजाय हरिद्वार जाएंगे। ट्रक के पीछे पढ़ा नहीं क्या आपने- धीरे चलोगे - घर मिलेगा, तेज़ चलोगे - हरिद्वार मिलेगा। ठीक ही है जो लेट है। आजकल तो विमान गायब हो रहे हैं, फिर ये ट्रेन कम से कम आई तो है। देर आए पर दुरुस्त आए।
मनमुताबिक उत्तर न पाने के कारण एंकर आगे बढ़ गया। कुछ ऐसे प्रश्न किए कि यात्री और हलकान हो गए। मसलन, आप कहाँ जा रहे हैं? क्या लगता है कि ट्रेन इतनी लेट कैसे हुई? क्या इसका मुख्य कारण मौसम है या कोई सरकारी वजह? जब आपको पता था कि इस समय मौसम खराब रहता है तो इसी ट्रेन से आरक्षण क्यों करवाया? क्या जाना ज़रूरी था? किससे मिलने जा रहे हैं? क्या पहले कभी सोचा था कि ट्रेन इतनी लेट हो सकती है?
यदि आप कोई रेल यात्रा करने वाले हों तो उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर अपनी पूर्वनियोजित यात्रा की भांति ही पूर्व-सू-नियोजित कर लें। क्या पता आपकी बोगी मे भी कल कोई रिपोर्टर घुस आए और आप पर बंदूक की तरह अपना माइक तान दे। तत्पश्चात आपके जले पे देश का नमक न सिर्फ छिड़के,वरन उड़ेल भी दे।    
                            -अभिषेक अवस्थी