Monday, 8 June 2015

Amar Ujala
स्वप्नलोक मे शिवजी, ताजमहल और मैं! (परिवर्धित लेख)
मैं सरकार की भांति सत्ता के पालने मे गहरी नींद के आगोश मे था। न जाने कब स्वप्नलोक मे विचरण हेतु पहुँच गया। यकायक मुझे भगवान शिव मेरी ओर आते दिखे। मेरी आश्चर्यमय प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही न रहा। न तो मैं प्रतिदिन मंदिर जाता हूँ। न ही सोमवार को शिवलिंग पे दूध बहाता हूँ। बावजूद इसके, भोलेभंडारी मुझे दर्शन दे रहे हैं। कलयुग मे मेरे जैसे सामान्य मनुष्य को भगवान के दर्शन होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। मैंने तो पुण्य टाइप कोई कांड भी नहीं किया। अंजाने मे ही सही, पापी तो मैं भी हूँ। लगता है भगवान(नों?) को भी जनता की प्रवृत्ति सी हो चली है। जैसे जनता हर बार कम भ्रष्टाचारी को अपना नेता चुनती है, वैसे ही भगवान भी कम पापी को भक्त समझ बैठे।
समीप आते ही मैं भगवान के चरणों मे लोट गया। बोला- प्रभु! अहो भाग्य हमारे, जो आप पधारे। किन्तु प्रभु! आप तो भगवान हैं, अंतर्यामी हैं। आपका नेटवर्क तो फाइव-जी से कहीं अधिक शक्तिशाली है। ऊपर से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा अपने मन की बात कह देते। शिवजी रहस्यमयी मुस्कान ढीलते हुए बोले- क्या करूँ पुत्र!, मनुष्यों के कारण जो अत्याचार और घृणा के काले-घने बादल छाए हैं, वे अब ब्रह्मांड मे भी अपने पाँव पसार रहे हैं। फलस्वरूप हमारे यहाँ भी नेटवर्क की भारी समस्या उत्पन्न हो गयी। इधर गुज़रते हुए त्रिनेत्र ने वाईफाई के तगड़े और फ्री नेटवर्क के संकेत दिए।
उनकी रहस्यमयी मुस्कान देख मैंने पूछा- हे पालनहार! क्या हुआ? आप इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जो छुपा रहे हो? 
वे बोले- पुत्र! क्या बताऊँ जैसे ही मेरी जटाओं ने वाईफाई का नेटवर्क पकड़ा, भारतभूमि से जुड़ी अनगिनत अधिसूचआएँ मेरे मन-मष्तिष्क की घंटी प्रतिपल बजा रहीं हैं इतनी घन्टियां तो मैने किसी सोमवार अथवा शिवरात्रि मे भी नही सुनी मैने कहा- किंतु प्रभु! आपको तो प्रसन्न होना चाहिए न भक्तों की तादात जितनी बढ़े, उतना अच्छा आजकल इन्द्रदेव फ़िर से अनियंत्रित हो रहे हैं इधर सरकार और उधर से वर्षा का हाहाकार न जाने कितनी ही घन्टियां तो इस देश के किसान ही बजा रहे होंगे जो बजाते-बजाते थक गए, इन्द्रदेव से प्रत्यक्षतः निपटने स्वर्गलोक निकल गए शंकर जी सीरीयस मोड मे आ गए बोले- बात वो नही है किसान तो सदैव ही परेशान रहता है इसमे इन्द्र को मत घसीटो मैने कहा- तो ठीक है प्रभु मुद्दे पे आइए कहने लगे- दरसल, वाईफाई ऑन होते ही यकायक अजीब से नोटिफिकेशन आए अच्छा खासा ताजमहल बना हुआ है उसके नीचे मेरे होने की बात कही जा रही है। मैं तो सर्वत्र हूँ अनावश्यक चक्करों मे मुझे फँसाया जाता है। चिंता तो होगी ही न? विद्यालयों मे इतना रटाया जाता है कि भैया ईश्वर-अल्लाह सब एक हैं किंतु न! तुमलोगों को कुछ याद ही कहाँ रहता है कभी बाबरी, कभी शिवमंदिर, कभी राममंदिर बस कोई न कोई बहाना चाहिए लड़ने का लाइमलाइट मे रहने का अब ताजमहल को ही लपेटे लिया अरे भाई, इतनी ख़ूबसूरत इमारत है सब मिलकर उसके जैसा सुंदर हृदय रखो और फ़िर ताजमहल के अंदर मैं हूँ या मेरे अंदर ताज, बात तो समान ही रहेगी कल और आज
इससे पहले कि प्रभु गुस्से मे तांडव जैसा कुछ कर बैठते, मैने मामला सम्भालते हुए कहा- अब आप ही कुछ उपाय बताएँ प्रभु! वे बोले- उपाय अत्यंत सरल है 'धर्मगुरुघंटालों' और नेताओं को चाहिए कि शांति'स्वरूप' और  प्रेम'योगी' बनकर जीवन का असल आनंद लें और सबको दें सौहार्द और सहयोग को 'साक्षी' मानकर 'आज़म-ए-ओवैसी' कहलाएं 
शंकरजी की बातें सुनकर मुझे लगा कि कहीं वे भावुकता मे बह न जाएँ मैने उन्हें बीच मे रोक कर कहा- हे प्रभु! ये नामुमकिन है हमारे यहाँ इंसान को बनाने वाले भगवान बदले जाते हैं इंसान नही बदले जाते है आपको कोई ठोस क़दम ही उठाना होगा इतना सुनते ही भोलेनाथ ने नन्दी को आवाज़ लगायी और जाने को तैयार हुए भगवान कब ठोस क़दम उठाएंगे, ये न पता चला किंतु नन्दी ने मुझपे एक लात देमारी और मुझे स्वप्न्लोक से बाहर फेंक दिया
                                  -अभिषेक अवस्थी



Thursday, 4 June 2015

नई दुनिया - अधबीच 04-06-15
ये आरक्षण का जिन्न जब तब बोतल से बाहर निकल आता है। सरकार अलादीन की भांति इसे तमाम जद्दोजहद करके हर बार बोतल मे बंद करती है। परंतु ये है कि गुलामी पसंद नहीं करता है। अपने चाहने वालों की सहायता से यह हर बार बोतल का ढक्कन खोल, कुछ तूफानी करने को आतुर हो जाता है। इस जिन्न का ‘इस्तेमाल’ करने वाले सहायक नाम के प्राणी भी कम नही हैं। जब-जब इनको लगता है कि मेहनत, शिक्षा और पराए सुख से इन्हें कष्ट है, तब-तब ये आरक्षण के जिन्न को ‘पेरोल’ पे आज़ाद करवाते हैं। तदुपरान्त रेलवे की पटरियों पे ये दोनों मिलकर अपना तांडव करते हैं। जिन्न को दूल्हे का रूप देकर अपने मतलब की घोड़ी को रेलवे ट्रैक पर दौड़ाते हुए, सरकारी दुल्हन तक पहुंचाया जाता है। प्रदर्शनकारी बारातियों को ये पूरा भरोसा रहता है कि भारत भर के रेलवे ट्रैक पर उनका मालिकाना हक़ है।
पिछले दिनों मैं भी एक ऐसे ही प्रसंग मे फंसा था। दरअसल हुआ यूँ कि जिस ट्रेन से मैं सफर कर रहा था, वह अचानक किसी वीरान जगह पे रुक गयी। रुकना कोई नई बात नहीं है। लेकिन किसी प्राइवेट अस्पताल की तरह साफ-सुथरे मौसम मे, एक सुपर फास्ट एक्सप्रेस ट्रेन का चार घंटे से ऊपर यथास्थान खड़े रहना अवश्य ही नयी बात है। अरे! एक रेलगाड़ी ही है न! कोई देश की गरीबी तो है नहीं कि जो अड़ियल बनकर एक ही स्थान पे टिकी रहे। न नीचे खिसकती है न ऊपर। मुई वहीं की वहीं धरी है। ख़ैर, जैसा की सदैव होता है, ट्रेन रुकते ही मेरी बोगी के अधिकांश ‘मर्द’ अपने माथे पे प्रश्नसूचक उभारते हुए नीचे उतार गए। ट्रेन रुकने पर मर्द अक्सर द्रुतगामी हो जाते हैं। वे आविलम्ब इंजन की ओर ऐसे लपकते हैं जैसे रेलवे का सम्पूर्ण अतलस्पर्शी ज्ञान उन्हें ही प्राप्त हो। कुछ महानुभाव तो इतना कॉन्फिडेंटली अपने क़दम इंजन की ओर बढ़ाते हैं, जैसे हर समस्या का निदान उनके पास ही उपलब्ध हो। गोया कि लोकोपायलट का पूरा कोर्स उन्होने आत्मसात किया है। यदि ड्राईवर बीमार हो गया तो वे ही गाड़ी ले उड़ेंगे। मैने भी अपना आलस्य त्यागा। मांजरा समझने हेतु खरामा-खरामा इंजन की ओर बढ़ा। पता चला कि कुछ प्रदर्शनकारी ट्रेन के आगे कटने को तैयार ‘पड़े’ थे। पास मे ही एक नौजवान प्रदर्शनकारी कोलड्रिंक पीता दिखा। समय बिताने के लिए मैंने उसे पकड़ा। सवाल जवाब शुरू हुए।
मैंने पूछा, ‘तुम तो अच्छे खासे नौजवान हो। मेहनत करो, पढ़ाई करो। उसके दम पे नौकरी पाओ। ये आडंबर क्यों?’
‘तो अभी भी तो मेहनत ही तो कर रहें हैं न बाबूजी...!’ युवक ने उत्तर मे कहा, ‘इत्ती धूप मे चेहरा लाल हुआ जा रहा है...जब औरों को आरक्षण मिल रहा है, तो हमारी बिरादरी को भी मिलना चाहिए न!’
‘इससे तुम्हें क्या फायदा क्या होगा?’
‘अजी! ज़ाहिर सी बात है...इत्ती रगड़म-रगड़ाई न करनी पड़ेगी। नंबर कम भी आएंगे तो आरक्षण को ढाल बनाकर नौकरी के चक्रव्युह को तोड़ देंगे...’
‘फिर तुम्हें आरक्षण मिलने के बाद, दूसरी बीरादरी वाले हल्ला मचाने लगेंगे,’ मैंने कहा।
वह बोला, ‘जी! मचाने दो हल्ला। वो भी मांगे आरक्षण...देखी जाए तो हम तो उनका भला ही करने निकले हैं जी...तुलसीदास कह गए हैं, “पर हित सरिस धर्म नहिं भाई” अर्थात...
‘इस पंक्ति का अर्थ मैं जानता हूँ’ मैंने उसे बीच मे रोकते हुए कहा, ‘तुमलोग स्वार्थी हो रहे हो... तुलसीदास जी तो यह भी कह गए हैं कि “पर पीड़ा सम नहिं अधमाई”। तुम्हारे कारण लाखों रेल यात्री व्यथित हैं। रेलवे का घाटा बढ़ रहा है...करोड़ों का नुकसान...’
‘ओ बाबूजी...’ इस बार बीच मे रोकने की बारी नौजवान की थी, सो वह बीच मे बोला, ‘ज़्यादा ज्ञान न बघारो... इत्ता ही ज़्यादा है तो सरकार मे बाँट दो... हम तो प्रदर्शन करते रहेंगे...दम हो तो ट्रेन हमारे ऊपर से ही चलवा दो...वरना बस पकड़ लो...ट्रेन तो हम न चलने देंगे जी...’
उसकी बातों का जवाब यही था कि मैं चुपचाप बस ही पकड़ लूँ। सोच रहा हूँ, तमाम रेलयात्रियों की ओर से रेल मंत्रालय को एक ‘रायनुमा’ पत्र लिखूँ। पत्र द्वारा मैं रेल मंत्रालय से विनम्र निवेदन करूंगा कि हर राज्य के हर शहर मे अलग से रेलवे ट्रैक का निर्माण हो। वहाँ कृत्रिम ट्रेनें चलें। एक अधिसूचना ज़ारी की जाए कि ये रेल ट्रैक सिर्फ और सिर्फ, प्रदर्शनकारियों के लिए विशेष रूप से निर्मित किया गया है। अतः, सभी छात्रनेताओं, किसाननेताओं, धर्मनेताओं, और प्रदर्शनप्रेमियों, को यह अधिकार है कि वे धरना और विरोध प्रदर्शन, जीत और हार प्रदर्शन, यहाँ तक कि जो अप्रदर्शनीय है, उसका भी प्रदर्शन करें। बाकी, चुनावकाल मे सरकार सबकी सुनती भी है, और वादों को ड्राफ्ट भी करती है।

Wednesday, 3 June 2015

हैप्पी बड्डे सरकार...

हैप्पी बड्डे सरकार...
सुना है सरकार का बड्डे हैवो भी हैप्पी वाला! कमाल है जीराष्ट्रीय छुट्टी भी नही घोषित हुई। अच्छे दिनबुलेट ट्रेन काला धन आदि नही आएन सही। किंतु भईपहले जन्मदिन के उपलक्ष्य मे आम टाइप वाले भाइयोंबहनों और मित्रों को एक अदद केक का टुकड़ा ही डाल देते। ख़ैरजहां देखा चारा वहां मुँह मारा की तर्ज़ पर एक नामी न्यूज़ चैनल के रिपोर्टरसरकार को जन्मदिन की बधाई देने के बहाने उनका साक्षात्कार कर लाए। उसी का कुछ भाग पेश-ए-खिदमत है-  
रिपोर्टर- सरकारश्रीआपको जन्मदिन की बधाई।
सरकर- ठीक हैअपने 'केक का टुकड़ालो और अपनी पर आ जाओ।
रिपोर्टर- आप एक वर्ष के हो गए। कैसा लग रहा है।
सरकर- सबकुछ नया नया सा लग रहा है। अभी तो पूरी दुनिया देखनी बाकी है। रिपोर्टर- तो आगे की क्या योजना हैसरकार - कहा न! दुनिया देखनी हैजश्न मनाना हैसरकार रूपी जन्म बार बार थोड़ी न मिलता है भाई।
रिपोर्टर- और कितने दिन जश्न मनाएंगेसरकार- जब तक बालिग नही हो जाते।
रिपोर्टर - अच्छाये मेक इन इंडिया का बड़ा शोर है। लेकिन जमीनी स्तर पे कुछ होता तो दिख नही रहा।
सरकार- क्यों नही होता दिख रहा है?  आदमी साल भर से ब रहा हैऔर हम बना रहे हैं। तो हुआ न मेक इन इंडिया?
रिपोर्टर- तो ऐसे विकास कैसे होगासरकार- देखोहर आदमी का विकास स्वयं उसका ही दायित्व है। इसमे हम क्या करेंहम तो 'अपनेविकास के दायित्व को तत्परता से पूर्ण करने हेतु शपथबद्ध हैं। रिपोर्टर- ओह! इस विषय मे थोड़ा विस्तार से बताइए।
सरकार- तुम रिपोर्टर लोग हमेशा बाल की खाल निकालने मे लगे रहते हो। देखोहमने न्यायपालिका को लगभग अपने कब्जे मे कर लिया है। तुम लोगो को तो पता ही होगाकैसे दनादन फैसले पे फैसले आ रहे हैं आजकल। एक दोहा टाइप सुनो, " पावर और पैसे काऐसा देखा मेल... तेरह साल मे जेल हुई,घंटे भर मे बेल..." हम तो इसी दोहे पे भरोसा रखते हैं। वो जुमला तो सुना होगा न "सबका साथसबका विकास"। बस थोड़ा फ़ेरबदल हुआ है उसमे। अब हो गया है, "सबका साथ,अपना विकास" रिपोर्टर- आपका जन्म हुए एक वर्ष बीत गया है। क्या कुछ ख़ास हुआ आपके साथ या आपने क्या ख़ास कियासरकार- बहुत कुछ ख़ास किया हमने। योजनाओं पे योजनाएँ लॉन्च करी। जैसे जनधन योजना। जनता का धनपहले बैंकों मे जाएगाफ़िर व्यापारियों के पासतत्पश्चात जोड़जाड़ के हमारे पास आयेगा। हमने ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं करी। स्वच्छता अभियान लॉन्च किया। बेटी पढ़ाओबेटी बचाओ मिशन लॉन्च किया। और तो और मंगल यान भी हमने ही लॉन्च किया।
रिपोर्टर- लेकिन स्वच्छता तो चुनावी जुमला टाइप हो गयी है। जमीनी स्तर पे दिखती ही नही है। और बेटियां पढ़ने-बचने की बजाय मर-कट रहीं हैं।
सरकार- देखोदोनों ही मामलों मे हम यही कहेंगे कि आदमी का विकास उसका ख़ुद का काम है।
रिपोर्टर- अच्छाआपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या हैसरकार- जी, 'घोषणाको 'चुनावी जुमलासिद्ध करना। जनता मे अब भी यह विश्वास बनाए रखना कि अच्छे दिन आएँगे।
रिपोर्टर- हमारे न्यूज़ चैनल के माध्यम से आप अपने जन्मदिन पर जनता को कुछ संदेश देना चाहेंगे। सरकार- जी ज़रूर। मित्रों... अच्छे दिन आएँगे। अवश्य आएँगेबस हमें बालिग होने दीजिए। अच्छे  दिन बुलेट ट्रेन की गति से आएँगे। हाँआप ध्यान रखें कि काला चश्मा धारण न करें। वरना बुलेट ट्रेन की गति से आ रहे अच्छे दिन आपको दिखेंगे नही। फ़िर आप हम पे दोषारोपण करेंगे कि अच्छे दिन सरपट निकल गए और बुलेट ट्रेन आप को ही रौंद करविदेश भ्रमण पे निकल गयी। धन्यवाद!          
                        -अभिषेक अवस्थी