Amar Ujala
स्वप्नलोक मे शिवजी, ताजमहल और मैं! (परिवर्धित लेख)
मैं सरकार की भांति सत्ता के पालने मे गहरी नींद के आगोश मे
था। न जाने कब स्वप्नलोक मे विचरण हेतु पहुँच गया। यकायक मुझे भगवान शिव मेरी ओर आते
दिखे। मेरी आश्चर्यमय प्रसन्नता का कोई ठिकाना ही न रहा। न तो मैं प्रतिदिन मंदिर
जाता हूँ। न ही सोमवार को शिवलिंग पे दूध बहाता हूँ। बावजूद इसके,
भोलेभंडारी मुझे दर्शन दे रहे हैं। कलयुग मे मेरे जैसे सामान्य मनुष्य को भगवान के
दर्शन होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। मैंने तो पुण्य टाइप कोई ‘कांड’ भी नहीं किया। अंजाने मे ही सही, पापी तो मैं भी हूँ। लगता है भगवान(नों?) को भी
जनता की प्रवृत्ति सी हो चली है। जैसे जनता हर बार कम भ्रष्टाचारी को अपना नेता
चुनती है, वैसे ही भगवान भी कम पापी को भक्त समझ बैठे।
समीप आते ही मैं भगवान के चरणों मे लोट गया। बोला- प्रभु!
अहो भाग्य हमारे, जो आप पधारे। किन्तु प्रभु! आप तो भगवान हैं, अंतर्यामी हैं। आपका नेटवर्क तो ‘फाइव-जी’ से कहीं अधिक शक्तिशाली है। ऊपर से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा अपने ‘मन की बात’ कह देते। शिवजी रहस्यमयी मुस्कान ढीलते हुए
बोले- ‘क्या करूँ पुत्र!, मनुष्यों के
कारण जो अत्याचार और घृणा के काले-घने बादल छाए हैं, वे अब
ब्रह्मांड मे भी अपने पाँव पसार रहे हैं। फलस्वरूप हमारे यहाँ भी नेटवर्क की भारी
समस्या उत्पन्न हो गयी। इधर गुज़रते हुए त्रिनेत्र ने वाईफाई के तगड़े और फ्री
नेटवर्क के संकेत दिए।
उनकी रहस्यमयी मुस्कान देख
मैंने पूछा- हे पालनहार! क्या हुआ? आप इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जो छुपा
रहे हो?
वे बोले- ‘पुत्र! क्या बताऊँ। जैसे ही मेरी जटाओं ने वाईफाई का नेटवर्क पकड़ा, भारतभूमि से जुड़ी अनगिनत अधिसूचआएँ मेरे मन-मष्तिष्क की घंटी प्रतिपल बजा रहीं हैं। इतनी घन्टियां तो मैने किसी सोमवार अथवा शिवरात्रि मे भी नही सुनी’। मैने कहा- किंतु प्रभु! आपको तो प्रसन्न होना चाहिए न। भक्तों की तादात जितनी बढ़े, उतना अच्छा। आजकल इन्द्रदेव फ़िर से अनियंत्रित हो रहे हैं। इधर सरकार और उधर से वर्षा का हाहाकार। न जाने कितनी ही घन्टियां तो इस देश के किसान ही बजा रहे होंगे। जो बजाते-बजाते थक गए, इन्द्रदेव से प्रत्यक्षतः निपटने स्वर्गलोक निकल गए। शंकर जी सीरीयस मोड मे आ गए। बोले- ‘बात वो नही है। किसान तो सदैव ही परेशान रहता है। इसमे इन्द्र को मत घसीटो’। मैने कहा- तो ठीक है प्रभु मुद्दे पे आइए। कहने लगे- दरसल, वाईफाई ऑन होते ही यकायक अजीब से नोटिफिकेशन आए। अच्छा खासा ताजमहल बना हुआ है। उसके नीचे मेरे होने की बात कही जा रही है। मैं तो सर्वत्र हूँ। अनावश्यक चक्करों मे मुझे फँसाया जाता है। चिंता तो होगी ही न? विद्यालयों मे इतना रटाया जाता है कि भैया ईश्वर-अल्लाह सब एक हैं। किंतु न! तुमलोगों को कुछ याद ही कहाँ रहता है। कभी बाबरी, कभी शिवमंदिर, कभी राममंदिर। बस कोई न कोई बहाना चाहिए लड़ने का। लाइमलाइट मे रहने का। अब ताजमहल को ही लपेटे लिया। अरे भाई, इतनी ख़ूबसूरत इमारत है। सब मिलकर उसके जैसा सुंदर हृदय रखो। और फ़िर ताजमहल के अंदर मैं हूँ या मेरे अंदर ताज, बात तो समान ही रहेगी कल और आज’।
वे बोले- ‘पुत्र! क्या बताऊँ। जैसे ही मेरी जटाओं ने वाईफाई का नेटवर्क पकड़ा, भारतभूमि से जुड़ी अनगिनत अधिसूचआएँ मेरे मन-मष्तिष्क की घंटी प्रतिपल बजा रहीं हैं। इतनी घन्टियां तो मैने किसी सोमवार अथवा शिवरात्रि मे भी नही सुनी’। मैने कहा- किंतु प्रभु! आपको तो प्रसन्न होना चाहिए न। भक्तों की तादात जितनी बढ़े, उतना अच्छा। आजकल इन्द्रदेव फ़िर से अनियंत्रित हो रहे हैं। इधर सरकार और उधर से वर्षा का हाहाकार। न जाने कितनी ही घन्टियां तो इस देश के किसान ही बजा रहे होंगे। जो बजाते-बजाते थक गए, इन्द्रदेव से प्रत्यक्षतः निपटने स्वर्गलोक निकल गए। शंकर जी सीरीयस मोड मे आ गए। बोले- ‘बात वो नही है। किसान तो सदैव ही परेशान रहता है। इसमे इन्द्र को मत घसीटो’। मैने कहा- तो ठीक है प्रभु मुद्दे पे आइए। कहने लगे- दरसल, वाईफाई ऑन होते ही यकायक अजीब से नोटिफिकेशन आए। अच्छा खासा ताजमहल बना हुआ है। उसके नीचे मेरे होने की बात कही जा रही है। मैं तो सर्वत्र हूँ। अनावश्यक चक्करों मे मुझे फँसाया जाता है। चिंता तो होगी ही न? विद्यालयों मे इतना रटाया जाता है कि भैया ईश्वर-अल्लाह सब एक हैं। किंतु न! तुमलोगों को कुछ याद ही कहाँ रहता है। कभी बाबरी, कभी शिवमंदिर, कभी राममंदिर। बस कोई न कोई बहाना चाहिए लड़ने का। लाइमलाइट मे रहने का। अब ताजमहल को ही लपेटे लिया। अरे भाई, इतनी ख़ूबसूरत इमारत है। सब मिलकर उसके जैसा सुंदर हृदय रखो। और फ़िर ताजमहल के अंदर मैं हूँ या मेरे अंदर ताज, बात तो समान ही रहेगी कल और आज’।
इससे पहले कि प्रभु गुस्से मे तांडव जैसा कुछ कर बैठते, मैने मामला सम्भालते
हुए कहा- अब आप ही कुछ उपाय बताएँ प्रभु! वे बोले- उपाय अत्यंत सरल है। 'धर्मगुरुघंटालों' और नेताओं को चाहिए कि शांति'स्वरूप' और प्रेम'योगी' बनकर जीवन का असल ‘आनंद’ लें और सबको
दें। सौहार्द और
सहयोग को 'साक्षी' मानकर 'आज़म-ए-ओवैसी' कहलाएं।
शंकरजी की बातें सुनकर मुझे लगा कि कहीं वे भावुकता मे बह न जाएँ। मैने उन्हें बीच मे रोक कर कहा- हे प्रभु! ये नामुमकिन है। हमारे यहाँ इंसान को बनाने वाले भगवान बदले जाते हैं। इंसान नही बदले जाते है। आपको कोई ठोस क़दम ही उठाना होगा। इतना सुनते ही भोलेनाथ ने नन्दी को आवाज़ लगायी और जाने को तैयार हुए। भगवान कब ठोस क़दम उठाएंगे, ये न पता चला किंतु नन्दी ने मुझपे एक लात देमारी और मुझे स्वप्न्लोक से बाहर फेंक दिया।
शंकरजी की बातें सुनकर मुझे लगा कि कहीं वे भावुकता मे बह न जाएँ। मैने उन्हें बीच मे रोक कर कहा- हे प्रभु! ये नामुमकिन है। हमारे यहाँ इंसान को बनाने वाले भगवान बदले जाते हैं। इंसान नही बदले जाते है। आपको कोई ठोस क़दम ही उठाना होगा। इतना सुनते ही भोलेनाथ ने नन्दी को आवाज़ लगायी और जाने को तैयार हुए। भगवान कब ठोस क़दम उठाएंगे, ये न पता चला किंतु नन्दी ने मुझपे एक लात देमारी और मुझे स्वप्न्लोक से बाहर फेंक दिया।
-अभिषेक अवस्थी

