Sunday, 6 July 2014

फेमस मेनिया...
हमारे देश मे लोग फेमस होने लिए भिन्न भिन्न हथकंडे अपनाते हैं। न्यूज़ चैनलों और अखबारों मे छाए रहने के लोलुपजन, बहुत ही सरलता से अपने फेमस होने की इच्छापूर्ति करते हैं। ये लोग आम से खास होने हेतु ऐसी ऐसी हरकतों का क्रियान्वयन करते हैं, कि आमजन की आँखें फट जाती हैं, कान बजने लगते हैं और ज़ुबान चटकारे लेने लगती है। कोई टीम इंडिया की जीत पर अपने ही वस्त्र हरण का ऐलान करता है, तो कोई सरेआम अपनी महिला मित्र को पीट देता है। कोई विरोधी पार्टी की सरकार बनने पर शोले का वीरू बन पानी की टंकी के स्थान पर बिजली के खंबे पर चढ़ फेमस हो जाता है।
विभिन्न मठों के मठाधीशों को जब अपनी ज़मीन खिसकती दिखाई देती है, तो वे अपनी धनुष रूपी ज़ुबान से फेमस गाँडीव छोड़ देते हैं। हमारे तथाकथित शंकराचार्य जी ने साईं बाबा पे अपने बयानों की ऐसी बाण वर्षा करी, कि बाबा जी रातों रात फेमस हो लिए। तमाम न्यूज़ चैनलों ने मोदी सरकार के रिपोर्ट कार्ड संग महाराज को भरपूर कवर दिया। बाबा जी पर ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं –
राखी और पूनम का पैंतरा/ ये भी सीख रहे हैं/ फेमस होने को अब तो /बाबाजी चीख रहे हैं।”
बुजुर्ग एवं कद्दावर नेताओं को भी यह फेमस कीट डंक मारता रहता है। कभी वे त्यागपत्रों की लाइन लगाते हैं, तो कभी मुचलका न भरने की जिद लिए जेल चले जाते हैं। उससे भी बढ़ कर, कुछ माननीय, अपने पाँव कब्र पे लटकाए, पुनर्विवाह के हसीन सपनों को साकार करने का ऐलान करते हैं। न्यूज़ वालों के रहमोकरम के चलते नेता जी दोबारा लाइमलाइट मे आ जाते हैं।
मेरे मित्र शौकिया तौर पर फेमस होने की आदत है। छोटी सी बात पर भी धरना दे डालते हैं। एक बार तो उनपर कृष्ण भक्ति का ऐसा सुरूर सवार हुआ कि राधा बन, देश विदेश मे अपनी परफॉर्मेंस दे आए। वे भी फेमस हो गए। सरकारी नौकरी मे जितना एक वर्ष मे कमाते थे, उतना वे अब दो – तीन माह मे घर ले आते हैं।
मेरे लेखक मित्र भी फेमस नाम की बीमारी से ग्रस्त हो गए थे। फेमस होने के चक्कर मे नए नए नुस्खे मुझे बताते। मसलन, सोच रहा हूँ...लेखन मे कुछ गालियों की सौगात लिखूँ, संग कुछ गंदी-गंदी बात लिखूँ’...’ किन्तु उनकी पत्नी ने ऐसी पंक्तियाँ सुनाई कि वे कुछ लिख ही न सके। वो पंक्तियाँ थीं –
इनको भी अच्छी सूझी है/अब टी वी पे आने की/कुछ काम नहीं बचा है/खाली पीली डुगडुगी बजाने की 
-    अभिषेक अवस्थी2014
  

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