एक पार्टी अपनी भी...
सोच रहा हूँ एक पार्टी अपनी भी बनाऊँ। घर मे रायशुमारी
करवाने भर की देर है बस। चौंकिए मत जनाब! मैं पेज थ्री पार्टी की बात नहीं कर रहा
हूँ, वरन ‘नैतिकता’ के आधार पर अपनी
अकेले की एक राजनैतिक पार्टी निर्माण के बारे मे बात चला रहा हूँ। पार्टी के जन्म
लेने के पश्चात कुछ पत्रकार, न्यूज़ एंकर, तथाकथित समाजसेवी, मौलवी साहब, किसी अंजाने मंदिर/पीठ के शंकराचार्य टाइप कोई बाबा और कई प्रवासी भारतीय
(जिसमे मेरे भी नाते रिश्तेदार शामिल हैं) अवसरानुकूल स्वयं को उपादेय साबित करते
हुए शामिल हो ही जाएँगे।
जिस प्रकार आज भारत मे ‘पॉलिटिकल’ पार्टियाँ उत्पन्न हो रही हैं, उससे आभासित यही हो
रहा है कि आगामी वर्षों (या शायद दिनों) मे हर दसवें व्यक्ति की अपनी पार्टी जन्म
लेगी। बिलकुल सखी ‘सावंत’ की माफिक। उस
दसवें आदमी की तथाकथित चिंता उसे ऐसा क़दम उठाने को मजबूर कर रही है। उसे लगता है
कि वही अपने देश को बदल सकता है, बस एक बार कुर्सी मिलने की
देर है। अपने धर्म प्रधान और कुछ कुछ एकतावादी देश मे हर मोहल्ले एवं सोसाइटी की ‘अपनी’ होलिका, ‘अपना’ रावण और अपने मंदिर-मस्जिद हैं तो हर गली
मोहल्ले की अपनी अपनी पार्टी क्यों नहीं हो सकती? थोड़े ही
समय मे आपको हर सौ क़दम पर मिलने वाले मंदिर मस्जिद की तरह ही जगह जगह पार्टी
कार्यालयों की भीड़ नज़र आने लगेगी। देश मे 1600 से ज़्यादा रजिस्टर्ड पार्टियाँ पहले
ही अपने सामाजिक और गैर सामाजिक कार्य कुशलतापूर्वक कर रहीं हैं। ‘आप’, ‘बाप’, ‘राप’- (मैडम ‘सावंत’ की पार्टी) जैसी न जाने कितनी ही पार्टियों
के नेता चुनावों मे अपनी जमानत भी नहीं बचा पाते हैं। फिर भी कुकुरमुत्तों की
भांति पार्टियों की खेती अपने चरम पर है।
मेरे पड़ोसी शर्मा जी ने तो अपनी पार्टी बना भी ली है। नाम
है ‘खाप’ अर्थात – ‘खास आम आदमी
पार्टी’। शर्मा जी खास स्वभाव वाले आम व्यक्ति जो ठहरे। उन्होने
ने चुनाव चिन्ह के पोस्टर मे अपने सुपुत्र ‘विकास’ की फोटो जड़ रखी थी और उसके नीचे नारा दिया- “ ‘विकास’ पर मोहर लगाएँ और रातों रात ‘खास’ बन जाएँ।” मैं भी कई दिन से ‘खाप’ की सदस्यता ग्रहण करने का सुविचार पाले था, किन्तु शर्मा जी ने मुझे अपनी पार्टी के काबिल ही नहीं समझा। बोले, ‘आप मे कुछ भी खास तो है नहीं, ठीक से खाँस भी नहीं पाते हैं... पार्टी से दूर रह
कर कलम ही घिसें, रिक्वायरमेंट हुई तो पड़ोसी के नाते एक आधा
नारा लिख दीजिएगा...फ्री मे। जय हिन्द!’
पार्टियों को पैसे की कोई कमी भी नहीं हैं। एन आर आई और
तमाम देसी आँखों मे अपने देश की तरक्की देखने वाले लोग ‘चन्दा’ तो दे ही देंगे। राजनीति की चादर लपेटे नयी पार्टियों की उत्पत्ति यूहीं
ज़ारी रहेगी। उन पार्टियों के मुखिया देश के ‘लीडर’ कहलाएंगे। अराजकता के बल पर जेल भी जाएंगे और मीडिया मे भी छाए रहेंगे। देखिये
जनाब! कहीं आपके पारिवारिक कर्म-धर्म भूमि के गर्भ मे अलग अलग मुद्दों, जाति, धर्म और धन के नाम पर दो भिन्न भ्रूण तो नहीं
पल रहे हैं। यदि ऐसा है, तो रजिस्ट्रेशन फॉर्म तुरंत मँगवाएँ
और बहती गंगा मे हांथ धोएँ।
---------------------- @2014अभिषेक अवस्थी
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