‘बड़े दिनों के बाद, आयी
वतन की याद...’
हर वर्ष की तरह, इस वर्ष भी स्वाधीनता दिवस के मंच
पे ‘स्वतंत्र’ होने के ‘नाटक’ की तैयारियां चल रही हैं। कलाकार
अभी पर्दे के पीछे हैं। कोई गांधी बनने के लिए लुंगी लपेट रहा है। कोई नेहरू बनने
के लिए गुलाब ढूंढ रहा है। नेता जितने भी थे, सब टाइड की सफेदी का विज्ञापन करने वाले हैं। शहीद
होने वाले लोग मिट्टी मे मिलेंगे, सो उन्होने लाल रंग वाली मिट्टी लपेट रखी है। बैकड्रॉप मे भारत माता चुपचाप
खड़ी हैं। हाथों मे तिरंगा लिए हैं। दोनों हिलडुल भी नहीं रहे हैं। ऐसा लग रहा है
मानों किसी सरकारी अस्पताल के आईसीयू के अंदर, वेंटीलेटर पे टिके हों। हालांकि वे
स्वतन्त्रतापूर्वक ‘नाटक’ के ‘निर्देशकों’ के आधीन हैं, और आदेश का पालन करना उनकी विवशता है। नाटक शुरू होने का समय तो हो गया है, किन्तु अभी मुख्य अतिथि नहीं
पधारे हैं। ‘कलाकारों’ को उनकी ‘स्लो’ आदत का पता है, सो वे इतमिनान ने ‘फास्टफूड’ ढकोलने मे लगे हैं। निर्देशक खुश हैं क्योंकि वे बिल
बढ़ाकर मुख्य अतिथि को देंगे। मुख्य अतिथि उसमे वृद्धि करके, आगे वाले डिपार्टमेन्ट मे सरका
देंगे। बिल बढ़ता जाएगा। नाटक का कुछ भाग यूं ही बढ़े हुए बिल द्वारा फ़ाइनेंस हो
जाएगा।
इस मौके के मद्देनज़र, सुरक्षा चाक-चौबन्द है। मजाल नहीं
कि परिंदा पर भी मारे। अगर मारेगा, तो मार दिया जाएगा। आज स्वतन्त्रता दिवस है, लेकिन उड़ने की आज़ादी परिंदे को भी नहीं है। तमाम
अतिथि आने लगे हैं। बीएमडबल्यू, ऑडी जैसी गाड़ियों की कतारें मुख्य द्वार पे लगी हैं। सूट, पैंट, टाई, और खादी के चमचमाते परिधानों के अंदर घुसे दर्शक गंभीर मुद्रा लिए उतर रहे
हैं। देखने से ही पता चल रहा है कि उनकी जांच की आवश्यकता नहीं हैं। वे स्वतंत्र
जो हैं। हाँ, उनके ड्राइवरों को कड़ी जांच से गुज़रना पड़ रहा है। वहीं से एक किसान, एक मज़दूर और एक भिखारी गुज़र रहे
थे। उन्हें भी पता था कि वर्षाऋतु मे लोगों के अंदर देशभक्ति के बादल उमड़ते हैं।
और महीने के बीचोंबीच बरस पड़ते हैं। उनके अंदर स्वतन्त्रता का भाव जागा। कौतुहूल
के साथ नाटक वाली जगह को देखने लगे। सोच रहे थे कि वे भी नाटक देखलें। देखलें कि
ये ‘स्वतन्त्रता वाले’ आखिर हर वर्ष कैसा ‘नाटक’ करते हैं। वे इस भ्रम मे थे कि नाटक स्वतन्त्रता पर
है, तो वे भी उसका मंचन
स्वतंत्रतापूर्वक देख सकते हैं। अक्सर अमीरों के बीच कोई गरीब खड़ा होता है तो वह
स्वयं को अपराधी सा मान लेता है। नज़रें चुराने लगता है। तीनों लजाती नज़रों के साथ
गेट की ओर गए। सुरक्षाकर्मियों ने टिकट मांग लिया। टिकट तो उनके पास था नहीं, सो लजाती नज़रें और गड़ गईं। बेचारे
‘टिकटीय रूप’ से स्वतंत्र न थे।
इतने मे मुख्य अतिथि की लैंडरोवर आ
गयी। सुरक्षाकर्मी सतर्क हो गए। किसान, मजदूर और भिखारी वहाँ से हटने लगे। किन्तु सुरक्षाकर्मियों मे मुस्तैदी का
आधिक्य हो चुका था। उन्होने अपनी मुस्तैदी का प्रदर्शन तीनों पे लठियाँ भांजकर कर
दिया। मुख्य अतिथि यह देख अंदर ही अंदर खुश हो गए। उनके सलाहकार ने उन्हें कान मे
कुछ कहा, तो वे मुस्कुरा दिए। पहले वे भी
नुक्कड़ नाटक किया करते थे। किन्तु जबसे ‘ऊपर’ उठे हैं, अत्यधिक ‘नाटकीय’ हो गए हैं। उन्होने सुरक्षाकर्मियों को तुरंत रोकते हुए कहा कि उन तीनों को
अंदर जाने दिया जाए। टिकट का पैसा ‘खाने’ के बिल मे जोड़ दिया जाए। किसान, मज़दूर और भिखारी खुश हुए। तीनों
अंदर घुसे और सबसे पीछे खड़े हो गए। मुख्य अतिथि अपना भाषण शुरू करने ही वाले हैं
कि अचानक किसान के मोबाइल मे किसी का फोन आया। पेट जब भूखा हो तो डाइटिंग की
नियमावली किसी को याद नहीं रहती। गरीबी मे इंसान दुनियादारी की नियमावली भूल सा
जाता है। उसके फोन की रिंगटोन की आवाज़ उतनी ही बुलंद है, जितनी भारत मे गरीबी बुलंद है। सबका ध्यान उसकी
रिंगटोन पे जाता है। जहां बज रहा था – ‘चिट्ठी आयी है, आयी है, चिट्ठी आयी है…बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद वतन की मिट्टी आयी
है...’
-अभिषेक अवस्थी