Saturday, 8 March 2014

नारी

ललचाती आँखों को,
चीरते हुए वह,
बढ़ती जाती मंज़िल की ओर,
ठंड मे भी माथे पर पसीना,
और शंकामय मन लिए,
सामने देखकर भी दाएँ-बाएँ
की आहटे लेते लेती वह,
बढ़ती जाती मंज़िल की ओर,
डूबते सूरज के साथ
डूबता जाता उसका भरोसा, और
शाम ढलते ही हर पुरुष उसे
एक शिकारी सा दिखता, सोचती
न जाने कब-कौन-कहाँ पर
अपना शिकारी पंजा मार दे, या
तेजाब फेंक मेरा
चेहरा ही बिगड़ दे।
पर अगले ही पल उसे
सुनाई देती एक आवाज़- बोली,
तू अब अबला थोड़ी है,
व्यर्थ क्यों डरती है?, अब
न कोई लाचारी न ही तू बेचारी है’, फिर
समझ गयी वह शक्ति है,
जिसके बिना संसार महत्वहीन है,
वह नारी है, नारी है।

       .......................................@अभिषेक अवस्थी2014